
राजधानी दिल्ली में इस बार गर्मी के मौसम में एक बार फिर क्लाउड-सीडिंग (Cloud Seeding) यानी कृत्रिम बारिश कराने की तैयारी चल रही है।
इसका मुख्य मकसद है:
- बढ़ते तापमान से राहत
- हवा में मौजूद प्रदूषण के कण कम करना
- आपातकालीन मौसम राहत उपाय तैयार रखना
ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक, IIT Kanpur पिछले ट्रायल के निष्कर्षों की समीक्षा कर रहा है और DGCA से एक और ट्रायल के लिए अनुमति मांगी गई है। दिल्ली सरकार का Economic Survey 2025-26 भी कहता है कि IMD के परामर्श से आगे और ट्रायल किए जा सकते हैं।

पहले क्या हुआ था? अक्टूबर 2025 का ट्रायल क्यों नहीं चला?
इससे पहले अक्टूबर 2025 में दिल्ली में क्लाउड-सीडिंग के ट्रायल किए गए थे।
लेकिन वे उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं करा सके।
असफलता की मुख्य वजह:
बादलों में पर्याप्त नमी नहीं थी
यानी बादल तो मौजूद थे, लेकिन उनमें उतनी जल-वाष्प (moisture) नहीं थी कि क्लाउड-सीडिंग के बाद वे बारिश में बदल जाते।
रिपोर्टों के अनुसार, उस समय नमी का स्तर लगभग 10–20% के बीच था, जो प्रभावी सीडिंग के लिए कमजोर माना गया। इसी वजह से दिल्ली में मापने लायक बारिश नहीं हो पाई।
फिर भी ट्रायल को “बेकार” क्यों नहीं माना जा रहा?
यह बहुत महत्वपूर्ण बात है।
हालांकि पिछला ट्रायल बारिश कराने में सफल नहीं रहा, लेकिन वैज्ञानिकों के हिसाब से वह सीख देने वाला प्रयोग था।
IIT Kanpur का कहना है कि पिछले दो ट्रायल्स से यह समझ बेहतर हुई कि:
- किस तरह के बादल चाहिए
- कितनी नमी जरूरी है
- किस ऊंचाई पर सीडिंग बेहतर हो सकती है
- किस समय उड़ान और रसायन छोड़ना ज्यादा प्रभावी होगा
यानी पिछला ट्रायल “फेल” कम, और डेटा-आधारित तैयारी ज्यादा माना जा रहा है। यही वजह है कि इस बार ज्यादा सटीक प्लानिंग की बात हो रही है।
IIT Kanpur की भूमिका क्या है?
इस पूरे प्रोजेक्ट का तकनीकी और वैज्ञानिक नेतृत्व IIT Kanpur कर रहा है।
IIT Kanpur क्या कर रहा है?
- पिछले ट्रायल्स का वैज्ञानिक विश्लेषण
- मौसम और नमी के डेटा की समीक्षा
- उपयुक्त बादलों की पहचान
- उड़ान योजना (flight planning)
- सीडिंग के लिए रसायनों और फ्लेयर्स का तकनीकी निर्धारण
यानी दिल्ली सरकार नीति और अनुमति का पक्ष संभाल रही है, जबकि वैज्ञानिक निष्पादन IIT Kanpur के जिम्मे है।
DGCA से अनुमति क्यों लेनी पड़ती है?
क्लाउड-सीडिंग कोई सामान्य मौसम पूर्वानुमान वाला काम नहीं है।
इसमें विमान इस्तेमाल होता है, इसलिए DGCA (Directorate General of Civil Aviation) की अनुमति जरूरी होती है।
क्यों?
क्योंकि इसमें शामिल होता है:
- तय हवाई क्षेत्र में उड़ान
- विमान से फ्लेयर्स/कण छोड़ना
- एयर ट्रैफिक सुरक्षा
- ऊंचाई, रूट और मौसम समन्वय
यानी यह सिर्फ “बादल देखकर बारिश करा दो” जैसा आसान काम नहीं, बल्कि एविएशन + मौसम विज्ञान + पर्यावरण का संयुक्त ऑपरेशन है। हाल के कवरेज में भी बताया गया है कि IIT Kanpur ने आगे के ट्रायल के लिए DGCA clearance मांगी है।
दिल्ली सरकार और IIT Kanpur के बीच समझौता कब हुआ था?
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग और IIT Kanpur के बीच 25 सितंबर 2025 को MoU (समझौता ज्ञापन) हुआ था।
इसी समझौते के तहत अक्टूबर 2025 में ट्रायल शुरू किए गए थे।
उस समय यह दिल्ली के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट था, जिसका मकसद था:
- कृत्रिम बारिश की व्यवहारिकता समझना
- प्रदूषण नियंत्रण में इसकी उपयोगिता जांचना
- आपातकालीन मौसम हस्तक्षेप की संभावना परखना
रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती योजना में कई ट्रायल का प्रावधान था।
इस बार गर्मी में ट्रायल क्यों करना चाह रहे हैं?
यह सवाल बहुत अहम है।
अबकी बार इस तकनीक को सिर्फ सर्दियों के प्रदूषण से नहीं, बल्कि गर्मी के मौसम से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
संभावित फायदे:
1) तापमान में राहत
अगर बारिश होती है, तो:
- जमीन का तापमान गिर सकता है
- हीटवेव जैसी स्थिति में अस्थायी राहत मिल सकती है
- शहरी गर्मी (Urban Heat) कम महसूस हो सकती है
2) हवा की सफाई
बारिश से:
- धूल
- PM2.5
- PM10
- अन्य निलंबित कण
कुछ हद तक नीचे बैठ सकते हैं।
इसलिए दिल्ली सरकार इसे Heat Relief + Pollution Relief दोनों के रूप में देख रही है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में इसका जिक्र क्यों अहम है?
जब कोई चीज़ Economic Survey में दर्ज होती है, तो उसका मतलब है कि सरकार उसे नीति स्तर पर गंभीरता से देख रही है।
दिल्ली के Economic Survey 2025-26 में क्लाउड-सीडिंग का जिक्र यह दिखाता है कि सरकार इसे सिर्फ एक मीडिया इवेंट नहीं, बल्कि शॉर्ट-टर्म इमरजेंसी टूल की तरह देख रही है। सर्वे में यह भी कहा गया कि IMD के परामर्श से आगे और ट्रायल किए जाएंगे।
यानी सरकार की सोच यह है:
“अगर सही मौसम मिला, तो कृत्रिम बारिश को एक सपोर्टिव टूल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।”
लेकिन बड़ा सवाल: क्या क्लाउड-सीडिंग सच में काम करती है?
इसका जवाब है — कभी-कभी, लेकिन हमेशा नहीं।
क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं है।
यह तकनीक मौजूदा बादलों को थोड़ा “प्रेरित” करती है, लेकिन जहां बादल ही न हों या नमी पर्याप्त न हो, वहां यह अक्सर असरदार नहीं होती।
सफलता किन पर निर्भर करती है?
- बादलों की मौजूदगी
- बादलों की मोटाई
- तापमान
- नमी का स्तर
- हवा की दिशा
- सही समय पर सीडिंग
इसलिए वैज्ञानिक समुदाय में भी इसे संभावित लेकिन सीमित तकनीक माना जाता है, न कि गारंटीड समाधान। अंतरराष्ट्रीय और भारतीय विशेषज्ञों ने भी दिल्ली के पिछले ट्रायल पर यही कहा कि यह शॉर्ट-टर्म और मौसम-निर्भर उपाय है।
आखिर क्लाउड-सीडिंग होती कैसे है?
अब आसान भाषा में समझिए।
क्लाउड-सीडिंग क्या है?
यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें बादलों के अंदर छोटे-छोटे कण पहुंचाए जाते हैं ताकि वहां मौजूद नमी बूंदों में बदलने लगे और बारिश की संभावना बढ़े।
इसमें क्या छोड़ा जाता है?
आमतौर पर:
- Silver Iodide
- Sodium Chloride (नमक आधारित कण)
- कुछ अन्य हाइग्रोस्कोपिक/आइस-न्यूक्लिएटिंग कण
इन कणों का काम होता है:
- बादलों के भीतर जल-वाष्प को आकर्षित करना
- बूंदों/बर्फीले क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया तेज करना
- बूंदों को इतना बड़ा बनाना कि वे गिर सकें
यानी तकनीक का उद्देश्य बादलों की प्राकृतिक प्रक्रिया को बढ़ावा देना होता है — बादल “बनाना” नहीं।
IMD और मौसम विज्ञान साहित्य के अनुसार, warm cloud seeding में सोडियम क्लोराइड जैसे कण और cold cloud seeding में silver iodide जैसे कण इस्तेमाल किए जाते हैं।
पिछले ट्रायल में क्या इस्तेमाल किया गया था?
पिछले ट्रायल में रिपोर्टों के अनुसार, बादलों में Silver Iodide और Sodium Chloride युक्त फ्लेयर्स छोड़े गए थे।
कैसे?
- एक छोटे विमान (जैसे Cessna) का इस्तेमाल किया गया
- बादलों के भीतर/किनारे फ्लेयर्स छोड़े गए
- इन फ्लेयर्स के जरिए रासायनिक कण बादलों में फैलाए गए
कई रिपोर्टों में आठ फ्लेयर्स का जिक्र किया गया है।
क्या इससे प्रदूषण सच में कम हो सकता है?
हां, लेकिन सीमित और अस्थायी तौर पर
अगर बारिश होती है, तो वह:
- हवा में तैरते कणों को नीचे ला सकती है
- धूल कम कर सकती है
- कुछ समय के लिए AQI सुधार सकती है
लेकिन यह समझना बहुत जरूरी है कि:
क्लाउड-सीडिंग प्रदूषण का इलाज नहीं, सिर्फ अस्थायी राहत है
क्योंकि असली स्रोत वही रहते हैं:
- वाहन धुआं
- निर्माण धूल
- औद्योगिक उत्सर्जन
- कचरा/बायोमास जलना
यानी अगर बारिश हो भी जाए, तब भी प्रदूषण दोबारा बढ़ सकता है। इसी वजह से विशेषज्ञ इसे “support tool” मानते हैं, “permanent solution” नहीं।
क्या इस बार सफलता की संभावना ज्यादा है?
संभावना बेहतर हो सकती है — अगर मौसम साथ दे
IIT Kanpur का संकेत यही है कि पिछले ट्रायल्स से अब उनकी समझ बेहतर हुई है।
इसका फायदा तभी मिलेगा जब:
- सही बादल मौजूद हों
- नमी पर्याप्त हो
- मौसम खिड़की (weather window) सही मिले
- ऑपरेशन समय पर हो
यानी इस बार तैयारी बेहतर हो सकती है, लेकिन सफलता अभी भी मौसम पर निर्भर रहेगी।
आम आदमी के लिए इस खबर का क्या मतलब है?
इस खबर का सीधा मतलब यह है कि दिल्ली सरकार और वैज्ञानिक संस्थान अब गर्मी और प्रदूषण से राहत के लिए तकनीकी प्रयोगों को गंभीरता से ले रहे हैं।
लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि:
- यह कोई “गर्मी खत्म करने वाली” तकनीक नहीं है
- यह अस्थायी राहत दे सकती है
- इसका असर मौसम पर निर्भर है
- और यह मूल समस्या का स्थायी समाधान नहीं है
खबर का आसान निष्कर्ष
सीधी भाषा में समझें:
- दिल्ली में फिर से क्लाउड-सीडिंग यानी आर्टिफिशियल बारिश की तैयारी हो रही है
- IIT Kanpur पिछले ट्रायल्स की समीक्षा कर रहा है
- DGCA से नए ट्रायल के लिए अनुमति मांगी गई है
- अक्टूबर 2025 के ट्रायल कम नमी के कारण सफल नहीं हो पाए थे
- दिल्ली सरकार इसे गर्मी और प्रदूषण दोनों से राहत के उपाय के रूप में देख रही है
- लेकिन क्लाउड-सीडिंग की सफलता पूरी तरह मौसम और बादलों की स्थिति पर निर्भर करती है



