Trump-Iran Tension: ट्रंप की नई चेतावनी से फिर चढ़ा कच्चा तेल, भारत में पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद को झटका, जानिए पूरी वजह

Business Desk। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई देने लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को लेकर नई चेतावनी और पश्चिम एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 90 डॉलर प्रति बैरल और WTI (वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट) लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है। कच्चे तेल में आई इस तेजी ने भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती की उम्मीदों को फिलहाल कमजोर कर दिया है।

क्यों बढ़ा कच्चे तेल का भाव?
जानकारों के अनुसार, जॉर्डन में अमेरिकी सेना पर हुए हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ी चेतावनी दी है, जबकि ईरान भी रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, जिससे कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जाता है।
पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद क्यों कम हुई?
कुछ समय पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई थी। उस समय यह उम्मीद जताई जा रही थी कि यदि कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहीं तो भारत में भी पेट्रोल और डीजल के दाम कम किए जा सकते हैं।
लेकिन अब हालात बदल गए हैं। कच्चे तेल के फिर महंगा होने से तेल विपणन कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में निकट भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना पहले की तुलना में कम मानी जा रही है।
हालांकि, भारत में ईंधन की खुदरा कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड के आधार पर तय नहीं होतीं। इनमें रुपये-डॉलर विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, केंद्र और राज्य सरकारों के कर तथा तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी अहम भूमिका निभाती है।
युद्धविराम पर क्यों नहीं बन रही बात?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के प्रयासों के बावजूद अब तक किसी ठोस युद्धविराम या समझौते पर सहमति नहीं बन पाई है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव और बढ़ता है तो—
- कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
- समुद्री व्यापार महंगा हो सकता है।
- बीमा और परिवहन लागत बढ़ सकती है।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
इसके अलावा, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर क्षेत्र में हमलों और व्यवधानों ने भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ाया है।
केवल पेट्रोल-डीजल ही नहीं, कई उद्योग होंगे प्रभावित
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ वाहन ईंधन तक सीमित नहीं रहता। तेल कई उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में भी इस्तेमाल होता है।
इन क्षेत्रों पर विशेष असर पड़ सकता है—
- प्लास्टिक उद्योग
- पेट्रोकेमिकल सेक्टर
- पेंट उद्योग
- शैंपू और कॉस्मेटिक उत्पाद
- सिंथेटिक फाइबर
- सड़क निर्माण (बिटुमेन)
- रसायन उद्योग
इन उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने पर उपभोक्ताओं को भी महंगे उत्पादों का सामना करना पड़ सकता है।
महंगा ईंधन कैसे बढ़ाता है महंगाई?
पेट्रोल और डीजल महंगे होने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
सबसे पहले परिवहन लागत बढ़ती है। इसके बाद—
- फल और सब्जियों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
- खाद्यान्न की ढुलाई महंगी हो सकती है।
- निर्माण सामग्री की लागत बढ़ सकती है।
- रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान महंगे हो सकते हैं।
यानी ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है कच्चे तेल का बाजार?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालता है।
यदि लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा रहता है तो—
- आयात बिल बढ़ सकता है।
- व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका रहती है।
- रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
- महंगाई बढ़ सकती है।
- सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
वित्त मंत्रालय ने भी जताई चिंता
भारत के वित्त मंत्रालय ने भी बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों पर चिंता व्यक्त की है। मंत्रालय का मानना है कि यदि लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा बना रहता है तो इसका असर राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) पर पड़ सकता है।
हालांकि मंत्रालय ने यह भी कहा है कि भारत की स्थिति फिलहाल मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बेहतर निर्यात प्रदर्शन के कारण अपेक्षाकृत संतुलित बनी हुई है।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया की स्थिति पर निर्भर करेगी। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन यदि सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर क्षेत्र में व्यवधान गहराता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल राहत मिलने की संभावना सीमित रह सकती है।



