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बस्तर दशहरा में बेल पूजा की अनूठी परंपरा, युग्म बेल को दिया जाएगा मां दंतेश्वरी का न्योता; विवाह जैसे उत्सव में सरगीपाल गांव

जगदलपुर। बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं, जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी लोक मान्यताओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां दशहरा केवल पर्व नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसी परंपरा के तहत अब बेल पूजा का अनुष्ठान अपने महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया है। सरगीपाल गांव में युग्म बेल की पूजा को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इस अनुष्ठान में प्राचीन बेल वृक्ष पर जोड़े में लगे फलों को देवी के विवाह जैसे मांगलिक संस्कार से जोड़कर देखा जाता है। परंपरा के अनुसार, इन युग्म बेल को विधिवत आमंत्रण देकर मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाएगा।

सरगीपाल गांव में निभाई जाएगी विशेष धार्मिक रस्म

बेल पूजा के लिए शनिवार देर रात मां दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी और मांझी-मुखिया सरगीपाल गांव पहुंचेंगे। यहां पारंपरिक विधि-विधान के साथ प्राचीन बेल वृक्ष की पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद वृक्ष पर जोड़े में लगे बेल के फलों को लाल वस्त्र से बांधकर मां दंतेश्वरी को आमंत्रित करने की रस्म निभाई जाएगी।

स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, युग्म बेल को भगवान शिव और माता पार्वती का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से इस अनुष्ठान को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। बेल के दोनों फलों को एक जोड़े के रूप में देखा जाता है और इन्हें देवी के मांगलिक आयोजन से जोड़कर पूजा जाता है। यह परंपरा बस्तर की धार्मिक मान्यताओं और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को भी दर्शाती है।

रविवार सुबह 11 बजे होगी विशेष पूजा-अर्चना

बेल पूजा का मुख्य आयोजन रविवार सुबह 11 बजे होगा। इस दौरान बस्तर राजपरिवार, राजगुरु, पुजारी, मांझी-मुखिया और गांव के ग्रामीण मौजूद रहेंगे। सभी की उपस्थिति में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की जाएगी। पूजा संपन्न होने के बाद बेल वृक्ष से दोनों फलों को विधिवत उतारा जाएगा।

इस पूरी प्रक्रिया में धार्मिक परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा जाता है। ग्रामीणों के लिए यह केवल पूजा का आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था को आगे बढ़ाने का अवसर भी है। गांव के लोग सामूहिक रूप से इस परंपरा में भाग लेते हैं और आयोजन को उत्सव के रूप में मनाते हैं।

बेटी के विवाह जैसा मनाया जाता है उत्सव

सरगीपाल में बेल पूजा की सबसे खास बात यह है कि ग्रामीण इसे अपनी पुत्री के विवाह जैसे मांगलिक संस्कार के रूप में मनाते हैं। पूजा के दौरान हल्दी लगाने और हल्दी-पानी छिड़कने जैसी रस्में निभाई जाती हैं। इन परंपराओं के बीच गांव का वातावरण विवाह समारोह जैसा हो जाता है।

पारंपरिक गीत-संगीत, गाजे-बाजे और सामूहिक सहभागिता से पूरा गांव उत्सव के रंग में रंग जाता है। ग्रामीणों की मान्यता और भावनात्मक जुड़ाव इस आयोजन को विशेष बनाते हैं। इसमें धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता और सामुदायिक परंपराओं की झलक भी देखने को मिलती है।

बस्तर की संस्कृति में ऐसे अनुष्ठान केवल धार्मिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय समाज की जीवनशैली, विश्वास और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि बेल पूजा के दौरान गांव के लोग पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं।

शोभायात्रा के साथ मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचेगा युग्म बेल

सरगीपाल गांव में पूजा की सभी रस्में पूरी होने के बाद युग्म बेल को पारंपरिक शोभायात्रा के साथ मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाएगा। मंदिर पहुंचने पर दोनों फलों की विधिवत स्थापना की जाएगी। इस तरह गांव में निभाई जाने वाली पूजा की परंपरा मां दंतेश्वरी मंदिर के धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ जाएगी।

युग्म बेल को मंदिर तक लाने की यह प्रक्रिया बस्तर दशहरा की परंपराओं में विशेष स्थान रखती है। इसमें गांव, राजपरिवार, पुजारी और मंदिर की धार्मिक व्यवस्था के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव दिखाई देता है। आयोजन के माध्यम से बस्तर की लोकआस्था और पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं की निरंतरता भी सामने आती है।

बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है बेल पूजा

बस्तर दशहरा देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सवों से अपनी अलग पहचान रखता है। यहां उत्सव की अनेक परंपराएं स्थानीय देवी-देवताओं, जनजातीय मान्यताओं, राजपरिवार और ग्रामीण समुदाय की सहभागिता से जुड़ी हैं। इसकी कई रस्में लंबे समय से चली आ रही हैं और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं।

बेल पूजा भी इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। युग्म बेल को देवी का निमंत्रण देने, विवाह जैसी रस्में निभाने और शोभायात्रा के साथ मंदिर तक लाने की परंपरा बस्तर की विशिष्ट धार्मिक संस्कृति को दर्शाती है।

सरगीपाल गांव में होने वाला यह आयोजन एक बार फिर यह संदेश देता है कि बस्तर दशहरा केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम भी है। आधुनिक समय में भी इन परंपराओं का जीवंत बने रहना बस्तर की विशिष्ट पहचान और लोगों की आस्था को दर्शाता है।

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