
दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा बहुत तेज है कि संसद का तीन दिनों का विशेष सत्र बुलाया जाएगा, जिसमें सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण बिल को पास कराएगी. अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकार के पास पर्याप्त संख्या है, जिसके बल पर वो इस बिल को पारित करवा सके. परिसीमन बिल और उसी से जुड़ता हुआ महिला आरक्षण बिल संविधान संशोधन विधेयक है जिसको पारित करने के लिए सदन में दो तिहाई बहुमत चाहिए होता है.

तब और अब की स्थिति में अंतर
पिछली बार जब सरकार ने जब इस बिल को पास कराने की कोशिश की थी तब उसमें सफल नहीं हो पाई थी और सरकार का बिल गिर गया था लेकिन तब डीएमके इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी और तृणमूल कांग्रेस में भी कोई टूट फूट नहीं हुई थी.
परिसीमन के मुद्दे पर आज डीएमके पार्टी की बैठक हो रही है जिसमें एम के स्टालिन यह तय करने वाले हैं परिसीमन बिल पर सरकार का साथ दिया जाए या नहीं. अभी तक इस मुद्दे पर डीएमके में कोई एक राय नहीं बन पाई है.
डीएमके के पास दो ही विकल्प हैं एक तो सरकार को परिसीमन बिल पर सर्मथन दे मगर इस पर डीएमके के कुछ सांसदों का कहना है कि फिर तो सरकार में शामिल ही हो जाया जाए और मंत्री बना जाए. इस धड़े का कहना है कि सरकार से उन्हें गारंटी मिलनी चाहिए कि तमिलनाडु की सीटों में कमी नहीं होगी और उसकी सीटों का अनुपात भी उत्तर के राज्यों की तरह ही बढ़ना चाहिए. डीएमके का दूसरा धड़ा परिसीमन के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ रहना चाहता है.
हां या ना वाली स्थिति में डीएमके
मगर दूसरी तरफ डीएमके नेता स्टालिन एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़े दिखते हैं, डीएमके भले ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा ना हो मगर वो नेहा वोरा, अभिजीत दीपके के सर्मथन में सोशल मीडिया में लिखते भी हैं यानि डीएमके हां या ना वाली स्थिति में है. सरकार पर थोड़ा दबाव भी बना कर रखना चाहती है. यदि डीएमके और बीजेपी का परिसीमन पर कोई समझौता हो जाता है तो यह भारतीय राजनीति में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि इसके जरिए बीजेपी को तमिलनाडु की राजनीति में पांव जमाने का अवसर मिल सकता है जिसकी वो बहुत दिनों से कोशिश कर रही है. बहुत साल पहले बीजेपी इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का हाथ पकड़ कर घुसी थी और बाद में बंगाल में जो हुआ वो इतिहास है.
अभी तक मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं
वैसे संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो चुका है मगर सरकार ने इस सत्र का सत्रावसान इसलिए नहीं किया है क्योंकि प्रावधान ये है कि कम समय की नोटिस पर भी सत्र बुलाया जा सके. यदि किसी सत्र का सत्रावसान कर दिया जाता है तो परंपरा है कि सरकार को नया सत्र बुलाने के लिए तीन हफ्ते का वक्त देना पड़ता है यही वजह है कि सरकार ने अभी तक मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया है ताकि जल्दी में संसद का विशेष सत्र बुलाना हो तो वक्त जाया ना हो. सरकार ने परिसीमन और महिला आरक्षण बिल को पास कराने के लिए 16-17 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाया था मगर बिल को पास नहीं करा सकी थी क्योंकि तब इंडिया गठबंधन मजबूती से डटा रहा था.उस वक्त तृणमूल कांग्रेस और डीएमके मजबूती के साथ खड़े रहे और सरकार का प्रयास विफल हो गया.
टीएमसी से उद्धव की शिवसेना तक सांसदों की हुई टूट
अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक भारतीय राजनीति में काफी कुछ बदल चुका है. तृणमूल कांग्रेस टूट चुकी है उसके 28 सांसदों में से 20 सांसद अलग हो कर एक नए दल में शामिल हो चुके हैं वहीं उद्धव शिवसेना के 9 में से 6 सांसद टूट कर शिंदे सेना में चले गए हैं और सबसे महत्वपूर्ण है कि तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद नए समीकरण बने और डीएमके इंडिया गठबंधन से बाहर हो गई है और उसके 18 सांसद किसी भी पाले में नहीं हैं, वो ना एनडीए में हैं और ना ही इंडिया गठबंधन में. यही वजह है कि इन्हीं 22 सांसदों पर सरकार की निगाह है. मगर हुआ ये है कि तमिलनाडु सरकार ने अपने विधानसभा से एक प्रस्ताव पास किया है जिसमें अगले 25 सालों तक लोकसभा की सीट फ्रीज करने की बात है और डीएमके उसका हिस्सा है.
सरकार डीएमके को अपनी तरफ करने में जुटी मोदी सरकार
सरकार ने अभी तक हार नहीं मानी है और डीएमके को अपने पाले में करने का प्रयास जारी है. यह भी कोशिश हो रही है कि डीएमके यदि सरकार के पक्ष में वोट ना करे तो कम से कम अनुपस्थित हो जाए जिससे लोकसभा का टोटल नंबर कम हो जाएगा और दो तिहाई बहुमत प्राप्त करना आसान हो सकता है. उसी के साथ सरकार शरद पवार वाली एनसीपी पर भी भरोसा कर रही है साथ ही उसकी नजर झारखंड मुक्ति मोर्चा, अकाली दल और उन सांसदों पर है जो अपनी पार्टी में हाशिए पर चले गए हैं.



