वंदे मातरम् पर शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत आमने-सामने, दो अंतरे गाने की पैरवी पर BJP सांसद ने कहा- ‘हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आइए’

नई दिल्ली। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में जारी राजनीतिक और सामाजिक बहस अब बॉलीवुड तक पहुंच गई है। दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की ओर से राष्ट्रगीत के शुरुआती दो अंतरों को ही गाने की पैरवी किए जाने के बाद बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। कंगना ने शर्मिला टैगोर की सोच को लेकर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम’ के नजरिए से बाहर निकलकर इस गीत और कविता को देखने की सलाह दी।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने 19 अगस्त 2026 को फैसला किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इसके लिए 1937 के अपने ऐतिहासिक प्रस्ताव का हवाला दिया है।
क्या कहा शर्मिला टैगोर ने?
शर्मिला टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ के बाद के अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों का उल्लेख करते हुए अपनी राय रखी। उनका तर्क था कि जिन धर्मों में एक ईश्वर की अवधारणा है, उनके अनुयायियों के लिए गीत के बाद के कुछ हिस्सों को स्वीकार करना कठिन हो सकता है।
इसी आधार पर उन्होंने शुरुआती दो अंतरों को बनाए रखने की बात कही। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई।
यहां यह समझना जरूरी है कि शर्मिला टैगोर की टिप्पणी एक व्यक्तिगत राय के तौर पर सामने आई है। इसे कांग्रेस के आधिकारिक फैसले से सीधे जोड़ना अलग विषय है, क्योंकि कांग्रेस का तर्क ऐतिहासिक रूप से 1937 में लिए गए अपने संगठनात्मक फैसले पर आधारित है।
कंगना रनौत ने दिया करारा जवाब
शर्मिला टैगोर की टिप्पणी सामने आने के बाद कंगना रनौत ने उनके बयान वाला वीडियो अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर किया और अपनी असहमति जताई।
कंगना ने कहा कि वह शर्मिला टैगोर के अपनी आपत्ति के बारे में खुलकर बोलने से खुश हैं, लेकिन एक कलाकार के तौर पर उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि कला और कविता को लेकर उनकी सोच इतनी सीमित कैसे हो सकती है।
कंगना का कहना था कि कविता और गीत में शब्दों का इस्तेमाल अक्सर रूपक के तौर पर होता है। कलाकार अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कल्पना, प्रतीकों और उपमाओं का इस्तेमाल करता है। इसलिए किसी रचना को केवल उसके धार्मिक संदर्भों के आधार पर देखने के बजाय उसके व्यापक भाव और संदेश को भी समझना चाहिए।
‘हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आइए’
कंगना ने अपनी प्रतिक्रिया में शर्मिला टैगोर से स्पष्ट तौर पर कहा कि उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आने’ की जरूरत है।
कंगना ने तर्क दिया कि किसी कविता में इस्तेमाल किए गए शब्दों और प्रतीकों को हमेशा शाब्दिक अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई कलाकार किसी शक्ति या सामर्थ्य का वर्णन करता है तो वह जरूरी नहीं कि किसी धार्मिक मान्यता का प्रत्यक्ष उल्लेख कर रहा हो।
कंगना ने अपने संदेश में एकता और आपसी भाईचारे पर भी जोर दिया। उन्होंने शर्मिला टैगोर के प्रति व्यक्तिगत सम्मान जताते हुए कहा कि वह उनसे प्यार करती हैं और उनके साथ गले मिलने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
स्वामी विवेकानंद के उदाहरण से समझाया ‘शक्ति’ का अर्थ
कंगना ने अपनी बात को समझाने के लिए स्वामी विवेकानंद के एक प्रसिद्ध कथन का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि जब विवेकानंद ने युवाओं की मांसपेशियों को लोहे और हड्डियों को स्टील जैसा मजबूत बनाने की बात कही थी, तो वे शरीर की वास्तविक बनावट का वैज्ञानिक विवरण नहीं दे रहे थे, बल्कि युवाओं की शक्ति और आत्मविश्वास का आह्वान कर रहे थे।
कंगना का तर्क था कि इसी तरह कविता में ‘शक्ति’ या दूसरे प्रतीकों का इस्तेमाल व्यापक अर्थ में किया जा सकता है। उनके मुताबिक, ऐसे साहित्यिक प्रतीकों को सीधे धार्मिक विवाद के चश्मे से देखने के बजाय उनके भावनात्मक और सांस्कृतिक संदर्भ को भी समझना चाहिए।
क्यों शुरू हुआ ‘वंदे मातरम्’ पर नया विवाद?
‘वंदे मातरम्’ को लेकर मौजूदा विवाद की शुरुआत कांग्रेस के उस फैसले से हुई, जिसमें CWC ने पार्टी के कार्यक्रमों में सिर्फ पहले दो अंतरे गाने के अपने पुराने रुख को दोहराया।
कांग्रेस ने कहा है कि वह 1937 के CWC प्रस्ताव का पालन कर रही है। उस समय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गीत के शुरुआती दो अंतरों के इस्तेमाल को लेकर निर्णय लिया था। कांग्रेस का कहना है कि इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे उस समय राष्ट्रीय एकता और विभिन्न समुदायों की भावनाओं को ध्यान में रखा गया था।
वहीं बीजेपी इस फैसले को लेकर कांग्रेस पर लगातार हमला कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले की आलोचना करते हुए इसे तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ा और कहा कि कांग्रेस को पूरे राष्ट्रगीत का सम्मान करना चाहिए।
कांग्रेस का क्या कहना है?
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने CWC के फैसले के बाद कहा कि पार्टी का रुख स्पष्ट है और वह 1937 के प्रस्ताव पर कायम है। कांग्रेस का कहना है कि यह कोई नया फैसला नहीं है, बल्कि पार्टी अपने ऐतिहासिक निर्णय का पालन कर रही है।
कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा है कि ‘वंदे मातरम्’ उनके लिए भावनात्मक विषय है, लेकिन बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद में बदल रही है।
बीजेपी का पलटवार
बीजेपी की ओर से कांग्रेस के फैसले को लेकर लगातार तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमित शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का दो अंतरे गाने का फैसला राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान की भावना के विपरीत है और इसे वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। इस विवाद के चलते ‘वंदे मातरम्’ अब केवल एक सांस्कृतिक या साहित्यिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय पहचान, इतिहास, धर्मनिरपेक्षता और राजनीति से जुड़े बड़े विमर्श का हिस्सा बन गया है।
15 अगस्त के कार्यक्रम से भी जुड़ा विवाद
इस विवाद के बीच स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस के कार्यक्रम को लेकर भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप हुआ था। बीजेपी ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी की संसदीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ‘वंदे मातरम्’ के दौरान बातचीत कर रहे थे।
बीजेपी ने इस पर आपत्ति जताते हुए माफी की मांग की थी, जबकि कांग्रेस की ओर से इसे संयोग बताया गया।
इसके बाद गोवा में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरे गाए गए। अगले दिन CWC ने औपचारिक रूप से 1937 के प्रस्ताव पर कायम रहने का फैसला कर दिया।
अब फिल्म इंडस्ट्री में भी दो अलग राय
‘वंदे मातरम्’ पर चल रही इस बहस में अब दो पीढ़ियों की चर्चित अभिनेत्रियों के अलग-अलग विचार सामने आए हैं। शर्मिला टैगोर ने धार्मिक विविधता और स्वीकार्यता को ध्यान में रखते हुए शुरुआती दो अंतरों तक सीमित रहने की बात रखी, जबकि कंगना रनौत ने इसे व्यापक सांस्कृतिक और साहित्यिक संदर्भ में देखने की अपील की।
कंगना की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को और सुर्खियों में ला दिया है। खास तौर पर उनका ‘हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आइए’ वाला बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
विवाद का सार
फिलहाल ‘वंदे मातरम्’ को लेकर तीन अलग-अलग स्तरों पर बहस चल रही है—ऐतिहासिक परंपरा, धार्मिक-सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक व्याख्या। कांग्रेस 1937 के अपने प्रस्ताव का हवाला देते हुए पार्टी कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे गाने पर कायम है, जबकि बीजेपी इसे राष्ट्रगीत के पूर्ण सम्मान से जोड़कर कांग्रेस पर निशाना साध रही है। इसी बीच शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत की अलग-अलग राय ने इस बहस को मनोरंजन जगत तक भी पहुंचा दिया है।



