उदय कोटक ने भारत को दी बड़ी सलाह, बोले- ‘सोने की पहेली सुलझाएं, संकट को कभी बेकार न जाने दें’

Uday Kotak on Indian Economy: दिग्गज बैंकर और कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक उदय कोटक ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर कई अहम बातें कही हैं। उन्होंने बढ़ते सोने के आयात, चालू खाते के घाटे (CAD), राजकोषीय घाटे, अर्थव्यवस्था के वित्तीयकरण और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कीं। साथ ही उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक संकट को भारत को सुधारों और निवेश में तेजी लाने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए।

उदय कोटक ने 18 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित ‘Conference on Financing India’s Journey Towards Viksit Bharat’ में यह बात कही। कार्यक्रम में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्री भी मौजूद थे।
सोने का आयात भारत के लिए क्यों बन रहा है बड़ी चुनौती?
उदय कोटक ने सबसे ज्यादा जोर भारत में सोने की बढ़ती मांग और उसके आयात पर दिया। उनका कहना है कि भारतीय परिवारों के पास बड़ी मात्रा में सोना है, जिसने व्यक्तिगत स्तर पर काफी संपत्ति बनाई है, लेकिन यह संपत्ति अर्थव्यवस्था की उत्पादक गतिविधियों में पर्याप्त रूप से इस्तेमाल नहीं हो रही है।
उन्होंने कहा कि भारत को ‘गोल्ड पजल’ यानी सोने की पहेली का समाधान तलाशना होगा। इसके लिए उन्होंने एक समिति बनाए जाने का सुझाव भी दिया, जो इस बात पर विचार कर सके कि लोगों की सोने की जरूरतों को बनाए रखते हुए घरेलू सोने की संपत्ति को अर्थव्यवस्था के लिए अधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है।
कोटक के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट करीब 25 अरब डॉलर था, जबकि सकल सोना आयात लगभग 72 अरब डॉलर रहा। उनका कहना था कि यदि सोने के आयात को अलग कर दिया जाए, तो भारत का चालू खाता अधिशेष में होता।
FY27 में 90 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है गोल्ड इंपोर्ट
कोटक ने वित्त वर्ष 2027 को लेकर भी एक अनुमान सामने रखा। उनके मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमत औसतन करीब 90 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो भारत का चालू खाता घाटा करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
इसी दौरान सोने का सकल आयात बिल 88 से 90 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान उन्होंने जताया। यानी सोने का आयात भारत के बाहरी खाते पर बड़ा दबाव डाल सकता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि ये उदय कोटक के अनुमान हैं, न कि सरकार या किसी आधिकारिक संस्था का अंतिम पूर्वानुमान।
सोने की कीमत बढ़ने से बढ़ रहा आयात बिल
भारत के सोने के आयात की कहानी केवल कितनी मात्रा में सोना देश में आया, इससे तय नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत बढ़ने पर समान मात्रा के आयात के लिए भी भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
इसी वजह से ऊंची वैश्विक कीमतों के दौर में सोने का कुल आयात बिल बढ़ सकता है, भले ही आयात की मात्रा उसी अनुपात में न बढ़े। कोटक की चिंता इसी बढ़ते वित्तीय बोझ से जुड़ी है।
‘आत्मसंतुष्टि की कोई गुंजाइश नहीं’
उदय कोटक ने भारत की आर्थिक प्रगति को स्वीकार करते हुए भी सुधारों की गति बनाए रखने पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारत ने काफी प्रगति की है, लेकिन मौजूदा वैश्विक माहौल में आत्मसंतुष्ट होने की गुंजाइश नहीं है।
उनके मुताबिक, दुनिया की अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे समय में भारत को अपनी विकास रणनीति पर लगातार काम करते रहना होगा।
उन्होंने वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में चीन की भूमिका का भी उल्लेख किया और उसके बड़े व्यापार अधिशेष को महत्वपूर्ण संकेत बताया।
राजकोषीय घाटे पर भी सख्ती की जरूरत
कोटक ने भारत के फिस्कल डेफिसिट यानी राजकोषीय घाटे को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्यों पर वित्तीय दबाव होने के बावजूद भारत को अपने वित्तीय प्रबंधन में और अनुशासन लाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि 7 प्रतिशत से अधिक के संयुक्त राजकोषीय घाटे की स्थिति में वित्तीय नीति को और सख्त करने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका समेत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने भी राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने की चुनौती मौजूद है।
अर्थव्यवस्था के ‘ओवर फाइनेंशियलाइजेशन’ से सावधान
उदय कोटक ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ते financialisation यानी वित्तीयकरण को लेकर भी सावधान किया।
भारत में पूंजी बाजार के विस्तार को उन्होंने महत्वपूर्ण बदलाव माना। पहले अर्थव्यवस्था में बचतकर्ता से उधार लेने वाले तक पैसा पहुंचाने का पारंपरिक मॉडल अधिक प्रमुख था, जबकि अब निवेशक सीधे कंपनियों और अन्य संस्थाओं को पूंजी उपलब्ध कराने वाले मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं।
लेकिन कोटक के मुताबिक समस्या तब पैदा होती है, जब वित्तीय बाजारों का मुख्य उद्देश्य पूंजी निर्माण से हटकर केवल ट्रेडिंग, वॉल्यूम और बाजार की गतिविधियों पर केंद्रित हो जाए।
भारत को वह बनाना होगा जो दुनिया खरीदना चाहती है
उदय कोटक ने भारत के विकास मॉडल में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत बताई। उनका कहना था कि देश को उन वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिन्हें दुनिया भारत से खरीदना चाहती है।
उनके अनुसार, महत्वपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं के लिए दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भरता भारत को वैश्विक संकटों के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके बजाय भारत को अपनी उत्पादन क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत करनी चाहिए।
‘Never Waste a Crisis’ का दिया संदेश
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को लेकर कोटक ने एक चर्चित सिद्धांत ‘Never waste a crisis’ का उल्लेख किया। उनका कहना था कि संकट केवल चुनौती नहीं होता, बल्कि जरूरी सुधारों को तेजी से लागू करने का अवसर भी बन सकता है।
उन्होंने भारत से सुधारों और निवेश की गति बढ़ाने की अपील की। कोटक ने कनाडा जैसे देशों में वैश्विक पूंजी आकर्षित करने के लिए किए जा रहे सुधारों का उदाहरण भी दिया।
केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर
कोटक ने भारत की आर्थिक मजबूती के लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत भी बताई। उनका कहना था कि देश के विकास की रणनीति में केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन मजबूत होना चाहिए।
उन्होंने वित्तीय क्षेत्र में रेगुलेशन और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की बात भी कही। उनके अनुसार, नियामकों को वित्तीय व्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, लेकिन ऐसा करते समय विकास की गति अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश का उदाहरण क्यों दिया?
उदय कोटक ने भारतीय कंपनियों को समझाने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कंपनियों की भूमिकाओं को सृजन, विस्तार और बदलाव के नजरिए से समझाया।
उनके अनुसार, भारत को केवल मौजूदा कारोबार को बढ़ाने वाली कंपनियों के साथ-साथ ऐसी कंपनियों की भी जरूरत है जो नए कारोबार और तकनीक का निर्माण करें तथा पुराने बाजारों को बदलने वाली नई सोच लेकर आएं। Moneycontrol के अनुसार, उन्होंने कंपनियों के इन वर्गों को Brahma, Vishnu और Mahesh की अवधारणा से जोड़ा।
भारत के लिए कोटक की बातों का सीधा मतलब
उदय कोटक के बयान को चार बड़े हिस्सों में समझा जा सकता है:
- सोने का आयात: बढ़ते आयात बिल और चालू खाते पर दबाव को लेकर समाधान खोजने की जरूरत।
- राजकोषीय अनुशासन: 7 प्रतिशत से अधिक के संयुक्त राजकोषीय घाटे के बीच वित्तीय सख्ती की आवश्यकता।
- वित्तीयकरण: शेयर बाजार और वित्तीय गतिविधियों का उद्देश्य वास्तविक पूंजी निर्माण और आर्थिक विकास से जुड़ा रहना चाहिए।
- तेज सुधार: वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारत को सुधार, निवेश और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की गति तेज करनी चाहिए।
कुल मिलाकर, उदय कोटक का संदेश यह है कि भारत ने आर्थिक मोर्चे पर महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता, महंगे सोने के आयात, राजकोषीय दबाव और बदलते वित्तीय ढांचे के बीच आगे के सुधारों की गति बनाए रखना जरूरी है। खास तौर पर सोने के आयात को लेकर उनका प्रस्ताव है कि ऐसा समाधान तलाशा जाए जो भारतीय परिवारों की सोने की जरूरतों और देश की बाहरी वित्तीय स्थिरता—दोनों को ध्यान में रखे।



