छत्तीसगढ़

केके रेललाइन बहाली के लिए दिन-रात जंग, 800 मजदूर और 80 मशीनें जुटीं; 18 अक्टूबर तक ट्रैक शुरू करने का लक्ष्य

बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाली किरंदुल-कोत्तावालसा (केके) रेललाइन पर भूस्खलन के बाद पैदा हुआ संकट अब रेलवे के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मल्लीगुड़ा रेलवे स्टेशन के पास रेलमार्ग बाधित हुए 21 दिन बीत चुके हैं, लेकिन यात्री ट्रेनों और माल परिवहन की आवाजाही अब तक प्रभावित है। रेलवे ने क्षतिग्रस्त ट्रैक को दोबारा सुरक्षित बनाने के लिए बड़े स्तर पर मरम्मत अभियान शुरू किया है। घटनास्थल पर करीब 800 मजदूर दिन-रात काम कर रहे हैं, जबकि जेसीबी, भारी ट्रक और ट्रैक्टर समेत लगभग 80 मशीनें और वाहन लगाए गए हैं।

रेलवे के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्षतिग्रस्त रेलखंड को दुरुस्त करने के साथ पहाड़ी क्षेत्र में मिट्टी के लगातार खिसकने और पानी के बहाव से निपटना है। 25 सितंबर को हुए भूस्खलन में करीब 60 मीटर रेलखंड के नीचे की मिट्टी बह गई थी। इसके चलते पटरी के नीचे का आधार कमजोर हो गया और घटनास्थल पर लगभग 40 फीट गहरा गड्ढा बन गया। इस नुकसान ने रेललाइन की बहाली के काम को बेहद जटिल बना दिया है।

रेलवे अधिकारियों की निगरानी में मरम्मत कार्य तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। विशाखापट्टनम और रायगड़ा रेल मंडल के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर चल रहे काम की प्रगति पर नजर रख रहे हैं। रेलवे सूत्रों के अनुसार, 18 अक्टूबर तक रेललाइन बहाल करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, ट्रेनों का परिचालन शुरू करने का अंतिम निर्णय मरम्मत पूरी होने, ट्रैक की मजबूती और सुरक्षा जांच के बाद ही लिया जाएगा।

25 सितंबर को भूस्खलन से क्षतिग्रस्त हुआ था रेलखंड

केके रेललाइन के मल्लीगुड़ा रेलवे स्टेशन के पास 25 सितंबर को हुए भूस्खलन ने रेल यातायात को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया। पहाड़ी से मिट्टी और मलबा खिसकने के कारण करीब 60 मीटर रेलखंड के नीचे की जमीन बह गई। इससे पटरी को सहारा देने वाली मिट्टी और आधारभूत संरचना को नुकसान पहुंचा।

घटनास्थल पर लगभग 40 फीट गहरा गड्ढा बन जाने के कारण मरम्मत का काम सामान्य ट्रैक सुधार की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया। रेलवे के लिए केवल पटरी को ठीक करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके नीचे मजबूत और स्थिर आधार तैयार करना भी जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी तरह की दुर्घटना का खतरा न रहे।

पहाड़ी इलाके की भौगोलिक परिस्थितियां भी चुनौती बढ़ा रही हैं। लगातार बहते पानी के कारण मिट्टी हटाने और क्षतिग्रस्त हिस्से को दोबारा भरने में दिक्कत आ रही है। ऐसे में मरम्मत कार्य के दौरान जमीन की स्थिरता और पानी की निकासी पर विशेष ध्यान देना पड़ रहा है।

800 मजदूर और 80 मशीनें संभाल रही हैं मोर्चा

रेललाइन की बहाली के लिए रेलवे ने बड़े स्तर पर संसाधन जुटाए हैं। घटनास्थल पर करीब 800 मजदूर अलग-अलग चरणों में काम कर रहे हैं। इसके साथ लगभग 80 मशीनें और वाहन तैनात किए गए हैं, जिनमें जेसीबी, भारी ट्रक और ट्रैक्टर शामिल हैं।

मरम्मत अभियान में क्षतिग्रस्त हिस्से से मिट्टी और मलबा हटाने, जमीन को दोबारा तैयार करने और रेललाइन के नीचे मजबूत आधार बनाने जैसे कार्य महत्वपूर्ण हैं। इतनी बड़ी संख्या में श्रमिकों और मशीनों की तैनाती का उद्देश्य काम को जल्द पूरा करना है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा मानकों का पालन करना भी उतना ही जरूरी है।

रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर चल रहे कार्यों की निगरानी कर रहे हैं। मरम्मत की गति के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि तैयार किया गया रेलखंड भारी मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों का भार सुरक्षित रूप से सहन कर सके।

लगातार बह रहा पानी बना सबसे बड़ी बाधा

मल्लीगुड़ा के पास रेललाइन की बहाली में सबसे अधिक परेशानी पहाड़ से लगातार आने वाले पानी के कारण हो रही है। पानी के बहाव से मिट्टी कमजोर होने और मरम्मत के लिए तैयार किए जा रहे आधार के प्रभावित होने का खतरा बना रहता है।

ऐसी परिस्थितियों में केवल मलबा हटाकर पटरी बिछाना पर्याप्त नहीं होता। पहले क्षतिग्रस्त हिस्से को स्थिर करना, मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करना और रेललाइन के नीचे मजबूत आधार तैयार करना आवश्यक होता है। इसके बाद ही ट्रैक को सुरक्षित परिचालन के योग्य बनाया जा सकता है।

इसी वजह से रेलवे के लिए बहाली की समयसीमा के साथ सुरक्षा को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण है। निर्धारित लक्ष्य के अनुसार काम पूरा करने का प्रयास जारी है, लेकिन वास्तविक परिचालन बहाली मरम्मत की स्थिति और तकनीकी जांच पर निर्भर करेगी।

यात्री ट्रेनों की आवाजाही रुकी, माल परिवहन पर भी असर

केके रेललाइन पर यातायात बाधित होने का असर यात्रियों के साथ उद्योगों और माल परिवहन पर भी पड़ रहा है। रेलमार्ग बंद होने से प्रभावित यात्री ट्रेनों की आवाजाही में व्यवधान आया है। वहीं, इस रेलखंड से होने वाली लौह अयस्क की ढुलाई भी प्रभावित हुई है।

बस्तर क्षेत्र के औद्योगिक परिवहन में इस रेललाइन की महत्वपूर्ण भूमिका है। लौह अयस्क को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए रेलमार्ग का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में लंबे समय तक परिचालन बाधित रहने से माल की आवाजाही, आपूर्ति व्यवस्था और रेलवे की कमाई पर असर पड़ सकता है।

यात्री ट्रेनों के प्रभावित होने से लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रेलमार्ग की बहाली में देरी होने पर यात्रियों और माल परिवहन से जुड़े कारोबारियों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

रेलवे को आर्थिक नुकसान, उद्योगों की चिंता बढ़ी

रेललाइन बंद रहने से रेलवे को राजस्व का नुकसान होने की आशंका है। यात्री सेवाओं के प्रभावित होने के साथ मालगाड़ियों की आवाजाही बाधित होने से परिचालन पर भी असर पड़ रहा है। इसके अलावा, औद्योगिक गतिविधियों के लिए जरूरी कच्चे माल और खनिजों के परिवहन में देरी होने से संबंधित कारोबार प्रभावित हो सकते हैं।

केके रेललाइन का महत्व केवल यात्री आवागमन तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र के खनिज परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों के लिए भी अहम मार्ग है। इसलिए इसकी जल्द बहाली स्थानीय अर्थव्यवस्था और माल परिवहन व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि, रेललाइन को जल्द शुरू करने की जरूरत के बावजूद सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। कमजोर आधार पर ट्रेनों का परिचालन शुरू करना जोखिम भरा हो सकता है। इसीलिए रेलवे के लिए क्षतिग्रस्त हिस्से को तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

18 अक्टूबर तक बहाली का लक्ष्य, सुरक्षा जांच के बाद चलेंगी ट्रेनें

रेलवे सूत्रों के मुताबिक, मल्लीगुड़ा के पास क्षतिग्रस्त केके रेललाइन को 18 अक्टूबर तक बहाल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए श्रमिकों और मशीनों की मदद से लगातार काम किया जा रहा है। वरिष्ठ अधिकारी भी मरम्मत की प्रगति पर निगरानी बनाए हुए हैं।

हालांकि, तय समयसीमा तक काम पूरा होने के बाद भी ट्रेनों का परिचालन तत्काल शुरू होना जरूरी नहीं है। सबसे पहले रेललाइन के आधार, पटरी की मजबूती और पूरे क्षतिग्रस्त हिस्से की सुरक्षा का आकलन किया जाएगा। तकनीकी जांच में संतोषजनक स्थिति सामने आने के बाद ही यात्री और मालगाड़ियों की आवाजाही शुरू करने का निर्णय लिया जा सकेगा।

फिलहाल, रेलवे की पूरी कोशिश है कि प्राकृतिक आपदा से क्षतिग्रस्त इस महत्वपूर्ण रेलमार्ग को जल्द से जल्द सुरक्षित बनाया जाए। करीब 800 मजदूरों और 80 मशीनों की मदद से चल रहा यह अभियान बस्तर के रेल संपर्क को बहाल करने के लिहाज से बेहद अहम है। अब सभी की नजरें मरम्मत कार्य की प्रगति और 18 अक्टूबर के निर्धारित लक्ष्य पर टिकी हैं।

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