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मोदी सरकार की सख्ती का असर! Meta ने CSAM कंटेंट पर लिया बड़ा एक्शन, जानिए क्या है पूरा मामला..

Meta Remove CSAM Content: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी गैरकानूनी सामग्री यानी CSAM (Child Sexual Abuse Material) को लेकर भारत सरकार का रुख लगातार सख्त होता जा रहा है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को साफ संदेश दिया है कि बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री जैसे गंभीर गैरकानूनी कंटेंट के मामले में कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकतीं।

इसी बीच Meta की ओर से CSAM से जुड़े कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई की खबर सामने आई है। Meta के प्लेटफॉर्म Facebook, Instagram और WhatsApp पर गैरकानूनी सामग्री की पहचान और उसे हटाने को लेकर कंपनी की प्रणालियों और मॉडरेशन प्रक्रिया पर भी लगातार सवाल और चर्चा होती रही है।

सरकार का कहना है कि कानून का उल्लंघन करने वाली सामग्री को हटाना सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी है। खासतौर पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है।

क्या है CSAM?

CSAM का पूरा नाम Child Sexual Abuse Material है। इसका मतलब ऐसी सामग्री से है जिसमें बच्चों के यौन शोषण या उनके यौन शोषण से संबंधित दृश्य अथवा अन्य गैरकानूनी सामग्री शामिल होती है।

ऐसी सामग्री न केवल बेहद गंभीर अपराध से जुड़ी होती है, बल्कि इसके निर्माण, प्रसारण, शेयरिंग या जानबूझकर उपलब्ध कराने पर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई हो सकती है।

सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के बढ़ते इस्तेमाल के कारण सरकार और कानून लागू करने वाली एजेंसियां इस तरह की सामग्री के ऑनलाइन प्रसार को रोकने पर विशेष जोर दे रही हैं।

सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को क्या संदेश दिया?

सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि सोशल मीडिया कंपनियों को भारतीय कानूनों का पालन करना होगा। गंभीर गैरकानूनी सामग्री के मामले में कंपनियां केवल प्लेटफॉर्म होने का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।

यही वजह है कि ‘Safe Harbour’ को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।

Safe Harbour के तहत कुछ परिस्थितियों में इंटरनेट प्लेटफॉर्म को अपने यूजर्स द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराने से कानूनी सुरक्षा मिलती है। हालांकि यह सुरक्षा शर्तों के साथ आती है और कानून का पालन करने की जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म पर भी रहती है।

किसी कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है या नहीं और किसी विशेष मामले में Safe Harbour लागू होगा या नहीं, इसका अंतिम कानूनी निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत किया जा सकता है।

Meta की मॉडरेशन प्रणाली पर क्यों उठे सवाल?

Meta दुनिया की बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों में शामिल है और उसके Facebook तथा Instagram जैसे प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में यूजर्स मौजूद हैं। ऐसे में प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी सामग्री को रोकना कंपनी के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।

CSAM जैसे गंभीर कंटेंट की पहचान के लिए कंपनियां आम तौर पर ऑटोमेटेड सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हैश-मैचिंग तकनीक और मानव मॉडरेशन जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करती हैं।

लेकिन इंटरनेट पर हर सामग्री की पहचान करना चुनौतीपूर्ण होता है। यही कारण है कि सरकारें सोशल मीडिया कंपनियों से लगातार बेहतर मॉडरेशन और तेज कार्रवाई की अपेक्षा कर रही हैं।

Meta की ओर से भी अपनी तकनीकी प्रणालियों और कंटेंट मॉडरेशन से जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर अधिकारियों के साथ चर्चा की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार मामले के कुछ पहलू दूसरे मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भी जुड़े हुए हैं।

PM मोदी का वीडियो हटने के बाद क्यों बढ़ा था विवाद?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर विवाद उस समय भी काफी बढ़ गया था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संबंधित एक वीडियो को Facebook से कुछ समय के लिए हटाए जाने की बात सामने आई थी।

यह वीडियो पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री के संदेश से संबंधित बताया गया था। वीडियो हटने की घटना के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठे।

इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से Meta के अधिकारियों से जवाब मांगे जाने और मामले को गंभीरता से लेने की खबरें सामने आई थीं।

इसी दौरान सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री से संबंधित डीपफेक वीडियो और भ्रामक सामग्री के प्रसार को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

इन घटनाओं ने भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन नीतियों, एल्गोरिदम और सरकार के निर्देशों के पालन को लेकर बहस को और तेज कर दिया।

संसदीय समिति ने भी जताई थी नाराजगी

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर संसदीय स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने प्रधानमंत्री से संबंधित वीडियो हटाए जाने के मामले को गंभीर बताया था।

समिति की ओर से यह तर्क दिया गया कि प्रधानमंत्री देश के करोड़ों नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके आधिकारिक संदेश से जुड़े कंटेंट को हटाने जैसी घटना की उचित जांच होनी चाहिए।

मामले में Meta से जवाब और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी की गई थी। इसी संदर्भ में Safe Harbour सुरक्षा खत्म किए जाने की संभावना को लेकर भी चेतावनी की चर्चा सामने आई थी।

प्लेटफॉर्म को CSAM हटाने के लिए क्यों कहा गया?

सरकार की चिंता केवल प्रधानमंत्री के वीडियो तक सीमित नहीं है। बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर भारत सरकार का रुख अलग स्तर पर सख्त है।

सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को निर्देश दिया है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद Child Sexual Exploitative and Abuse Material जैसी गैरकानूनी सामग्री की पहचान कर उसे हटाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।

इसका उद्देश्य बच्चों को ऑनलाइन शोषण, ब्लैकमेलिंग, ग्रूमिंग और गैरकानूनी सामग्री के प्रसार से बचाना है।

ऐसी सामग्री के खिलाफ कार्रवाई में देरी होने पर उसका प्रसार तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए प्लेटफॉर्म के लिए केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि प्रभावी तकनीकी निगरानी और रिपोर्टिंग सिस्टम भी जरूरी हैं।

AI से बनी आपत्तिजनक सामग्री पर भी सरकार सख्त

आज के समय में AI और डीपफेक तकनीक के कारण सोशल मीडिया पर नकली वीडियो और तस्वीरें बनाना आसान हो गया है। इसी वजह से सरकार का ध्यान AI-generated content की पहचान और लेबलिंग पर भी है।

AI से तैयार या बदली गई सामग्री के संबंध में लागू नियमों के तहत प्लेटफॉर्मों को आवश्यक परिस्थितियों में उचित लेबलिंग और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होती है।

खासकर ऐसी सामग्री जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है, धोखाधड़ी कर सकती है या बच्चों तथा महिलाओं के खिलाफ अपराध को बढ़ावा दे सकती है, उसके खिलाफ तेजी से कार्रवाई जरूरी है।

भारत ही नहीं, दूसरे देश भी सोशल मीडिया को लेकर चिंतित

सोशल मीडिया के संभावित नुकसान को लेकर चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अन्य देशों में भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, हानिकारक कंटेंट, गलत सूचना और AI-generated सामग्री को लेकर सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

दुनिया भर की सरकारें अब सोशल मीडिया कंपनियों से ज्यादा पारदर्शिता, बेहतर कंटेंट मॉडरेशन और यूजर्स की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग कर रही हैं।

Meta के लिए आगे क्या चुनौती?

Meta के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी सामग्री को तेजी से पहचानकर हटाए और साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि वैध सामग्री को गलती से सेंसर न किया जाए।

CSAM जैसे मामलों में कार्रवाई की जरूरत बेहद स्पष्ट है, लेकिन बड़े पैमाने पर कंटेंट मॉडरेशन तकनीकी रूप से जटिल प्रक्रिया है।

कंपनी को AI आधारित पहचान प्रणाली, मानव मॉडरेशन, यूजर रिपोर्टिंग और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ सहयोग को मजबूत करना होगा।

क्या Safe Harbour खत्म हो सकता है?

Safe Harbour को लेकर सबसे अहम बात यह है कि यह कोई पूर्ण या असीमित छूट नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कानून और निर्धारित नियमों के तहत कई जिम्मेदारियां पूरी करनी होती हैं।

यदि किसी मामले में कंपनी कानून के अनुरूप अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं करती है, तो उसके कानूनी संरक्षण पर सवाल उठ सकता है। हालांकि किसी विशेष मामले में Safe Harbour लागू होगा या नहीं, इसका अंतिम फैसला संबंधित कानूनी प्रक्रिया और अदालत के निर्णय पर निर्भर कर सकता है।

निष्कर्ष

भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही को लेकर सरकार का रुख पहले की तुलना में ज्यादा सख्त दिखाई दे रहा है। खासकर CSAM, डीपफेक, महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री और अन्य गैरकानूनी कंटेंट के मामलों में प्लेटफॉर्मों से तत्काल कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है।

Meta की ओर से CSAM कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई इसी व्यापक दबाव और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बढ़ती सख्ती के बीच महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

हालांकि इसे केवल किसी एक घटना के दबाव का परिणाम बताने के बजाय भारत में सोशल मीडिया रेगुलेशन और ऑनलाइन सेफ्टी को लेकर बढ़ती कानूनी सख्ती के व्यापक संदर्भ में देखना ज्यादा उचित होगा।

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