नायब तहसीलदार-जनपद सदस्य पर 1 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप, जमीन की पूरी रकम लेने के बाद भी नहीं हुई रजिस्ट्री; पैसे लौटाने से भी इनकार

आरंग। छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के आरंग क्षेत्र में जमीन सौदे को लेकर करीब 1.01 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। रायपुर निवासी कुलदीप पाण्डेय ने कुछ प्रभावशाली लोगों पर जमीन की पूरी रकम लेने के बावजूद तय समय पर रजिस्ट्री नहीं कराने और बाद में रकम वापस नहीं करने का आरोप लगाया है। आरोप जिन लोगों पर लगाए गए हैं, उनमें राज आशीष मांडले, जो नायब तहसीलदार बताए जा रहे हैं, अमर आशीष मांडले, जो आरंग जनपद पंचायत सदस्य हैं, त्रिविहार आशीष मांडले और अगरबाई मांडले के नाम शामिल हैं।

कुलदीप पाण्डेय ने आरंग में आयोजित पत्रकार वार्ता में पूरे मामले की जानकारी देते हुए कहा कि उन्होंने वर्ष 2024 में भानसोज, आरंग स्थित जमीन को खरीदने के लिए संबंधित जमीन मालिकों के साथ विधिवत एग्रीमेंट किया था। उनके मुताबिक, जमीन के सौदे के लिए उन्होंने कुल 1 करोड़ 1 लाख रुपये का भुगतान किया था।
हालांकि, जमीन की रजिस्ट्री नहीं होने और रकम वापस नहीं मिलने के बाद अब दोनों पक्षों के बीच विवाद गहरा गया है। पीड़ित ने पुलिस में शिकायत देने के बावजूद FIR दर्ज नहीं होने का भी आरोप लगाया है। दूसरी ओर, जनपद सदस्य अमर आशीष माण्डले ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा जमीन खरीदार पर तय समय में रजिस्ट्री नहीं कराने का आरोप लगाया है।
जमीन खरीदने के लिए हुआ था एग्रीमेंट
कुलदीप पाण्डेय के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2024 में भानसोज क्षेत्र में जमीन खरीदने के लिए राज आशीष मांडले, अमर आशीष मांडले, त्रिविहार आशीष मांडले और अगरबाई मांडले के साथ अनुबंध किया था।
इस जमीन सौदे में राकेश कुमार बागरेचा और शशांग बागरेचा भी प्रारंभिक एग्रीमेंट में पक्षकार के तौर पर शामिल बताए गए हैं।
पीड़ित का दावा है कि एग्रीमेंट के आधार पर उन्होंने जमीन की रकम का बड़ा हिस्सा बैंक के माध्यम से और कुछ राशि नकद दी। उनके अनुसार कुल 1.01 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जिसमें 88 लाख रुपये बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए और 13 लाख रुपये नकद दिए गए।
कुलदीप का कहना है कि भुगतान से संबंधित जानकारी एग्रीमेंट के दस्तावेजों में भी दर्ज है।
एग्रीमेंट के बाद रजिस्ट्री को लेकर विवाद
पीड़ित के मुताबिक, एग्रीमेंट के कुछ समय बाद जनपद सदस्य अमर आशीष मांडले खुद उनके घर पहुंचे और जमीन का सौदा आगे नहीं बढ़ाने की बात कही।
जब कुलदीप ने अपनी ओर से दी गई रकम वापस मांगी तो कथित तौर पर रकम लौटाने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने संबंधित सभी पक्षों को कानूनी नोटिस भेजा।
कुलदीप के अनुसार, नोटिस मिलने के बाद जमीन विक्रेताओं की ओर से एग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार रजिस्ट्री कराने की सहमति जताई गई। हालांकि, इसके साथ सीमांकन पूरा होने के बाद रजिस्ट्री कराने की शर्त रखी गई।
सीमांकन और फसल के नाम पर करीब एक साल तक टलती रही रजिस्ट्री
कुलदीप का आरोप है कि इसके बाद रजिस्ट्री के लिए लगातार समय बढ़ाया जाता रहा। कभी फसल तो कभी जमीन के सीमांकन का हवाला देकर मामला टाला गया।
पीड़ित के अनुसार, जब तय समय सीमा निकल गई और सीमांकन की प्रक्रिया भी पूरी हो गई, तब भी जमीन की रजिस्ट्री नहीं की गई।
यहीं से विवाद और गंभीर हो गया।
अब 30 से 40 लाख रुपये अतिरिक्त मांगने का आरोप
कुलदीप पाण्डेय का आरोप है कि अब उनसे जमीन की रजिस्ट्री के लिए 30 से 40 लाख रुपये अतिरिक्त देने की मांग की जा रही है।
उनका कहना है कि उन्होंने जमीन की लगभग पूरी तय रकम पहले ही चुका दी है। इसके बावजूद अतिरिक्त रकम की मांग की जा रही है। आरोप है कि अतिरिक्त रकम देने से इनकार करने पर उन्हें जमीन किसी अन्य व्यक्ति को बेचने और बाद में पैसे लौटाने की बात कही जा रही है।
पीड़ित ने इसे अनुबंध की शर्तों के विपरीत बताते हुए मामले में कार्रवाई की मांग की है।
SP कार्यालय और थाने में शिकायत, FIR नहीं होने का आरोप
कुलदीप पाण्डेय ने बताया कि उन्होंने मामले की लिखित शिकायत रायपुर पुलिस अधीक्षक कार्यालय और आरंग थाना में करीब दो महीने पहले की थी।
उनका दावा है कि शिकायत के बावजूद अब तक मामले में FIR दर्ज नहीं की गई है। पीड़ित ने आरोप लगाया कि जमीन सौदे से जुड़े लोगों में से एक नायब तहसीलदार और दूसरा जनपद पंचायत सदस्य जैसे प्रभावशाली पदों पर है, जिसके चलते पुलिस कार्रवाई प्रभावित हो रही है।
हालांकि, यह पीड़ित पक्ष के आरोप हैं। पुलिस की ओर से मामले में FIR या जांच की स्थिति को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।
जनपद सदस्य अमर आशीष माण्डले ने आरोपों को बताया गलत
वहीं, पूरे मामले में आरंग जनपद पंचायत सदस्य अमर आशीष माण्डले ने कुलदीप पाण्डेय के आरोपों का खंडन किया है। उनका कहना है कि जमीन की रजिस्ट्री कराने में खरीदार की ओर से ही देरी हुई।
अमर आशीष माण्डले के मुताबिक, 30 अक्टूबर 2024 को हुए एग्रीमेंट में जमीन की रजिस्ट्री छह महीने के भीतर कराने की शर्त रखी गई थी। उनका दावा है कि तय समय सीमा में खरीदार ने रजिस्ट्री नहीं कराई।
इसके बाद खरीदार के आग्रह पर उन्हें तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया। माण्डले का कहना है कि अतिरिक्त समय दिए जाने के बाद भी रजिस्ट्री नहीं कराई गई।
30 जुलाई 2025 को फिर बनाया गया एग्रीमेंट
जनपद सदस्य के मुताबिक, इसके बाद दोनों पक्षों के बीच 30 जुलाई 2025 को नया एग्रीमेंट किया गया। इस नए समझौते में फिर से रजिस्ट्री के लिए एक महीने का समय दिया गया।
अमर आशीष माण्डले का कहना है कि इस एग्रीमेंट में स्पष्ट रूप से यह शर्त लिखी गई थी कि यदि एक महीने के भीतर रजिस्ट्री नहीं होती है या किसी भी पक्ष की ओर से सौदा रद्द किया जाता है, तो संबंधित जमीन को किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया जाएगा।
इस आधार पर जनपद सदस्य ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे धोखाधड़ी के आरोप सही नहीं हैं।
दोनों पक्षों के दावों में विरोधाभास
इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
कुलदीप पाण्डेय का आरोप है कि उन्होंने जमीन की पूरी रकम यानी करीब 1.01 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया, लेकिन विक्रेताओं ने रजिस्ट्री नहीं की और अब अतिरिक्त 30-40 लाख रुपये की मांग की जा रही है।
वहीं अमर आशीष माण्डले का कहना है कि खरीदार ने एग्रीमेंट में तय समय सीमा के भीतर रजिस्ट्री नहीं कराई। उनके अनुसार खरीदार को पहले छह महीने, फिर तीन महीने और बाद में एक महीने का अतिरिक्त समय दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद रजिस्ट्री नहीं हुई।
ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति एग्रीमेंट की मूल शर्तों, भुगतान के दस्तावेज, बैंक ट्रांजैक्शन, रजिस्ट्री की समय-सीमा और दोनों पक्षों के बीच हुए बाद के समझौतों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
पुलिस जांच के बाद साफ होगी तस्वीर
फिलहाल जमीन सौदे को लेकर दोनों पक्षों के बीच गंभीर आरोप-प्रत्यारोप हैं। एक तरफ खरीदार ने 1.01 करोड़ रुपये लेने के बाद भी रजिस्ट्री नहीं करने और रकम वापस नहीं करने का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी तरफ जनपद सदस्य ने खरीदार पर ही तय समय में रजिस्ट्री नहीं कराने की बात कही है।
अब इस मामले में पुलिस शिकायत पर क्या कार्रवाई करती है और दस्तावेजों की जांच के बाद क्या तथ्य सामने आते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल किसी भी पक्ष के आरोप को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।



