Inflation Rises in India 2026: 5 महीने में दाल-तेल ने बिगाड़ा बजट, दूध-चीनी-चावल भी महंगे; त्योहारों से पहले बढ़ी महंगाई की चिंता….

नई दिल्ली। देश में आम आदमी की रसोई पर महंगाई का दबाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। पिछले करीब पांच महीनों में रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली ज्यादातर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। 28 फरवरी से 3 अगस्त 2026 के बीच 16 प्रमुख खाद्य वस्तुओं में से 15 की कीमतों में इजाफा दर्ज किया गया। इस दौरान सबसे ज्यादा असर दालों और खाद्य तेलों की कीमतों पर देखने को मिला है।
महंगाई की यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब देश में त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान खाद्य वस्तुओं की मांग सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। ऐसे में अगर सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियां अनुकूल नहीं रहीं तो आने वाले महीनों में कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, सरकार की ओर से खाद्यान्न उत्पादन और सरकारी स्टॉक को लेकर भी राहत के संकेत मिले हैं। हाल की सरकारी जानकारी के अनुसार दालों और अनाजों की खुदरा कीमतें व्यापक रूप से स्थिर रही हैं, जबकि खाद्य तेलों में ज्यादा तेजी देखी गई है।

5 महीने में 16 में से 15 जरूरी खाद्य वस्तुएं महंगी
उपभोक्ता मामले विभाग के Price Monitoring System से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी से 3 अगस्त के बीच 16 प्रमुख खाद्य वस्तुओं में से 15 की कीमतें बढ़ी हैं।
इसका सीधा असर आम परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है। दाल, तेल, दूध, चीनी और चावल जैसी चीजें ऐसी हैं जिनकी खरीदारी लगभग हर घर में नियमित रूप से होती है। इसलिए इनकी कीमत में कुछ रुपये की बढ़ोतरी भी महीने के कुल घरेलू खर्च को प्रभावित करती है।
खासकर दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी चिंता का विषय है, क्योंकि दोनों ही रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा हैं।
दालों की कीमत में सबसे ज्यादा उछाल
पिछले पांच महीनों में दालों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
| खाद्य वस्तु | कीमत में बढ़ोतरी |
|---|---|
| चना दाल | ₹4.65 प्रति किलो |
| अरहर दाल | ₹5.96 प्रति किलो |
| उड़द दाल | ₹5.71 प्रति किलो |
| मूंग दाल | ₹4.55 प्रति किलो |
| सरसों तेल | ₹7.56 प्रति लीटर |
| दूध | ₹3 प्रति लीटर |
| चीनी | ₹2.25 प्रति किलो |
| चावल | ₹1.57 प्रति किलो |
| नमक | ₹0.85 प्रति किलो |
इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सरसों तेल और अरहर दाल में दिखाई देती है। यानी जिन परिवारों के भोजन में दाल और तेल का इस्तेमाल अधिक है, उनके मासिक राशन खर्च पर इसका असर ज्यादा पड़ सकता है।
खाद्य तेल की कीमत ने बढ़ाई रसोई की चिंता
खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी आम उपभोक्ताओं के लिए खास चिंता का विषय है। खाना बनाने से लेकर पकौड़े, पूड़ी और अन्य व्यंजन तैयार करने तक तेल का इस्तेमाल होता है।
भारत खाद्य तेल की घरेलू जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल और सोया ऑयल जैसी कमोडिटी की कीमतों में बदलाव का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा और कमोडिटी बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। यदि आयात लागत बढ़ती है तो इसका असर खाद्य तेल के घरेलू दामों पर भी पड़ सकता है।
सरसों तेल में ₹7.56 तक की बढ़ोतरी
आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच महीनों में सरसों तेल करीब ₹7.56 प्रति लीटर महंगा हुआ है।
खाद्य तेल की कीमत में यह बढ़ोतरी छोटे और मध्यम आय वाले परिवारों के बजट को प्रभावित कर सकती है। त्योहारों के दौरान घरों में पकवान और तली हुई चीजों की खपत बढ़ने के कारण तेल की मांग भी बढ़ती है। यही वजह है कि त्योहारी सीजन में तेल की कीमतों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
दूध, चीनी और चावल भी हुए महंगे
महंगाई का असर केवल दाल और तेल तक सीमित नहीं रहा। दूध, चीनी और चावल जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भी बढ़े हैं।
दूध की कीमत करीब ₹3 प्रति लीटर, जबकि चीनी करीब ₹2.25 प्रति किलो महंगी हुई। वहीं चावल की कीमत में लगभग ₹1.57 प्रति किलो और नमक में करीब ₹0.85 प्रति किलो की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
अलग-अलग वस्तुओं में बढ़ोतरी भले ही कुछ रुपये की दिखती हो, लेकिन जब परिवार महीने भर में कई किलो दाल, चावल, चीनी और तेल खरीदता है तो कुल खर्च में इसका असर साफ दिखाई देता है।
चीनी महंगी होने के पीछे क्या कारण?
चीनी की कीमत में बढ़ोतरी के पीछे कई आपूर्ति और मांग संबंधी कारक हो सकते हैं। आपके दिए विश्लेषण के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने की बढ़ती मांग और चीनी उत्पादन पर दबाव इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
गन्ने से चीनी के साथ-साथ एथेनॉल भी तैयार किया जाता है। यदि गन्ने का ज्यादा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है तो चीनी की उपलब्धता पर दबाव बन सकता है।
इसके अलावा उत्पादन और बाजार में उपलब्ध स्टॉक की स्थिति भी कीमतों को प्रभावित करती है।
आटे की कीमत में ज्यादा तेजी क्यों नहीं आई?
राहत की बात यह है कि आटे की कीमत में बड़ी तेजी नहीं देखी गई। इसके पीछे गेहूं की सरकारी खरीद और पर्याप्त सरकारी स्टॉक अहम वजह मानी जा रही है।
जब बाजार में सरकारी भंडार से पर्याप्त गेहूं उपलब्ध रहता है तो आपूर्ति पर दबाव कम होता है। इससे आटे की कीमतों में अचानक बड़ी तेजी की संभावना कम रहती है।
यही कारण है कि जहां दाल और तेल की कीमतों में ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली, वहीं आटा अपेक्षाकृत स्थिर रहा।
कमजोर मानसून से दालों पर दबाव
दालों की कीमतों को लेकर एक बड़ी चिंता खरीफ फसलों की बुवाई से जुड़ी है। 2026 के मानसून सीजन में शुरुआती दौर में बारिश कमजोर और असमान रहने के कारण कई खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार जुलाई में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में पीछे चल रही थी।
खासकर दालों की बुवाई में कमी चिंता बढ़ाने वाली रही है। 24 जुलाई तक खरीफ दालों का रकबा पिछले साल की तुलना में 7 फीसदी से अधिक कम बताया गया था। इससे उत्पादन घटने, आयात की जरूरत बढ़ने और आगे कीमतों पर दबाव बनने की आशंका जताई गई।
दालों की बुवाई कम हुई तो क्या होगा?
अगर खरीफ सीजन में दालों का उत्पादन उम्मीद से कम रहता है तो बाजार में घरेलू सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में तीन चीजें देखने को मिल सकती हैं—
- घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता कम हो सकती है।
- सरकार और कारोबारियों की आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।
- सप्लाई की कमी होने पर खुदरा कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, अभी खरीफ बुवाई का सीजन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जुलाई में कहा था कि बुवाई की अवधि 15 अगस्त तक खुली है और बारिश में सुधार होने पर रकबा बढ़ सकता है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कम बुवाई का असर निश्चित रूप से बड़े उत्पादन घाटे में बदलेगा।
त्योहारों का सीजन बढ़ा सकता है मांग
अगस्त से देश में त्योहारों का सिलसिला तेज होने वाला है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र और दीपावली के दौरान खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ती है।
त्योहारों के दौरान खासकर—
- दाल
- खाद्य तेल
- चीनी
- दूध
- आटा
- चावल
- सूखे मेवे
- मसाले
जैसी वस्तुओं की मांग बढ़ सकती है।
यदि मांग बढ़ने के साथ बाजार में सप्लाई पर्याप्त नहीं रही तो कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
पश्चिम एशिया तनाव का भी असर
खाद्य तेलों की कीमतों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार महत्वपूर्ण है। भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों, शिपिंग लागत और मुद्रा विनिमय दर में बदलाव का असर घरेलू कीमतों पर पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक कमोडिटी बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। इसके अलावा पाम ऑयल और सोया ऑयल जैसी प्रमुख खाद्य तेल श्रेणियों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी घरेलू बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
रसोई के बजट पर कितना असर?
एक सामान्य परिवार महीने में कई किलो दाल, चावल और चीनी खरीदता है और कई लीटर खाद्य तेल का इस्तेमाल करता है। ऐसे में किसी एक वस्तु की कीमत में मामूली बढ़ोतरी ज्यादा बड़ी नहीं लगती, लेकिन कई वस्तुओं के दाम एक साथ बढ़ने पर कुल मासिक राशन खर्च बढ़ जाता है।
उदाहरण के तौर पर अगर एक परिवार महीने में 5 किलो दाल, 5 किलो चीनी, 10 किलो चावल और 5 लीटर तेल खरीदता है, तो कीमतों में कुछ रुपये प्रति यूनिट की बढ़ोतरी भी कुल बिल में स्पष्ट अंतर पैदा कर सकती है।
यानी महंगाई का असली असर सिर्फ किसी एक वस्तु की कीमत से नहीं, बल्कि पूरे राशन बास्केट की संयुक्त कीमत से समझा जाता है।
आगे क्या रहेगा महंगाई का रुख?
आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई की दिशा मुख्य रूप से चार बातों पर निर्भर करेगी—
पहला, अगस्त में मानसून और खरीफ फसलों की बुवाई कैसी रहती है।
दूसरा, दालों और तिलहनों का उत्पादन कितना होता है।
तीसरा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल की कीमतें और आयात लागत किस दिशा में जाती हैं।
चौथा, त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने पर बाजार में सप्लाई कितनी पर्याप्त रहती है।
अगर बारिश में सुधार होता है और खरीफ बुवाई का रकबा बढ़ता है तो आगे उत्पादन को लेकर चिंता कुछ कम हो सकती है। दूसरी तरफ, अगर दालों और तिलहनों की बुवाई कम रहती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा बना रहता है तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है।
आम आदमी के लिए राहत कहां?
महंगाई के बीच राहत की बात यह है कि गेहूं और कई अनाजों की उपलब्धता को लेकर सरकारी स्टॉक मजबूत रहने से आटा और कुछ अन्य खाद्यान्नों पर तत्काल बड़ा दबाव नहीं दिख रहा है। सरकारी स्तर पर खाद्य कीमतों की निगरानी भी की जाती है।
हालांकि, दाल और खाद्य तेल ऐसी श्रेणियां हैं जिन पर घरेलू उत्पादन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार और आयात का भी असर पड़ता है। इसलिए इन दोनों की कीमतों पर आने वाले महीनों में खास नजर रहेगी।
निष्कर्ष
पिछले पांच महीनों में दाल, तेल, दूध, चीनी और चावल जैसी जरूरी वस्तुओं के महंगे होने से आम परिवार के राशन बजट पर दबाव बढ़ा है। सरसों तेल में ₹7.56 और अरहर दाल में करीब ₹5.96 प्रति किलो की बढ़ोतरी खास तौर पर ध्यान खींचती है।
अब अगस्त से शुरू हो रहा त्योहारी सीजन महंगाई के लिए अगली बड़ी परीक्षा है। यदि मांग बढ़ने के साथ पर्याप्त सप्लाई बनी रहती है तो कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। लेकिन कमजोर खरीफ बुवाई, दालों की संभावित कमी और अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल बाजार में तेजी बनी रही तो आने वाले महीनों में रसोई का बजट और बिगड़ सकता है।



