मवेशी तस्करी मामलों में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ट्रायल खत्म होने तक आरोपियों को नहीं मिलेंगे जब्त पशु..

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मवेशी तस्करी और कृषि उपयोगी पशुओं के अवैध परिवहन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि पुलिस किसी मामले में मवेशियों को जब्त करती है, तो मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक उन्हें आरोपी, वाहन चालक या स्वयं को मालिक बताने वाले व्यक्ति को सुपुर्दनामा (सुपुर्दगी) पर नहीं दिया जा सकता। ऐसे सभी पशुओं को केवल पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान की देखरेख में रखा जाएगा।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला जशपुर जिले के मनोरा पुलिस चौकी क्षेत्र से जुड़ा है। पुलिस ने एक ट्रक (HR-55-Q-5980) को रोककर उसमें से 28 भैंसें बरामद की थीं। इनमें 23 नर और 5 मादा भैंसें शामिल थीं।
पुलिस जांच में आरोप लगाया गया कि इन मवेशियों को छत्तीसगढ़ से झारखंड के कत्लखाने ले जाया जा रहा था। इसके बाद पुलिस ने ट्रक और सभी पशुओं को जब्त कर लिया।
बाद में झारखंड के गुमला निवासी मोहम्मद वसीम कुरैशी ने अदालत में आवेदन देकर दावा किया कि वह इन मवेशियों का मालिक है और उन्हें सुपुर्दनामे पर वापस दिया जाए।
हालांकि, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), जशपुर ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने सेशन कोर्ट में अपील की, लेकिन वहां भी निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा गया।
मामला हाईकोर्ट कैसे पहुंचा?
निचली अदालतों के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच को लगा कि पहले दिए गए ‘जलील अंसारी बनाम छत्तीसगढ़ शासन’ फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। इसलिए पूरे मामले को अंतिम निर्णय के लिए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली डिवीजन (लार्जर) बेंच के पास भेज दिया गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि:
- जब्त किए गए कृषि उपयोगी पशुओं को मुकदमे के अंतिम फैसले तक आरोपी, वाहन चालक या कथित मालिक को नहीं सौंपा जा सकता।
- ऐसे पशुओं की देखभाल केवल पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान करेंगे।
- यदि आरोपियों को ही पशु वापस दे दिए जाएं तो कानून का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
अदालत ने किस कानून का हवाला दिया?
हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 7 और धारा 18 का उल्लेख किया।
इन धाराओं के अनुसार:
- जब्त किए गए कृषि उपयोगी पशुओं को मुकदमे के अंतिम निर्णय तक सुरक्षित स्थान पर रखा जाएगा।
- उनकी अभिरक्षा केवल अधिकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान को दी जा सकती है।
Special Law क्यों माना गया यह कानून?
अदालत ने कहा कि छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 एक विशेष कानून (Special Law) है।
भारतीय कानून का सिद्धांत है कि यदि किसी विषय पर विशेष कानून मौजूद है, तो उस विषय पर सामान्य कानून लागू नहीं होगा।
यही कारण है कि अदालत ने कहा कि:
- सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की सुपुर्दगी संबंधी धाराओं का उपयोग करके मजिस्ट्रेट जब्त पशुओं को आरोपी या कथित मालिक को नहीं सौंप सकते।
- विशेष कानून की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाएगी।
सुपुर्दनामा क्या होता है?
सुपुर्दनामा एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें किसी जब्त संपत्ति या वाहन को अदालत कुछ शर्तों के साथ उसके दावेदार या मालिक को मुकदमे के दौरान अस्थायी रूप से वापस सौंप देती है।
लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मवेशी तस्करी से जुड़े मामलों में कृषि उपयोगी पशुओं के संबंध में यह व्यवस्था लागू नहीं होगी।
अदालत ने कानून के उद्देश्य पर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि यह कानून किसानों के उपयोग में आने वाले पशुओं की सुरक्षा और अवैध तस्करी रोकने के उद्देश्य से बनाया गया है।
यदि पुलिस द्वारा जब्त किए गए पशुओं को फिर से उन्हीं लोगों को लौटा दिया जाए जिन पर तस्करी का आरोप है, तो:
- कानून का उद्देश्य विफल हो जाएगा।
- अवैध पशु तस्करी पर रोक लगाने का प्रयास कमजोर पड़ जाएगा।
- पशुओं की सुरक्षा प्रभावित होगी।
इसलिए अदालत ने कहा कि मुकदमे के अंतिम निर्णय तक पशुओं को केवल अधिकृत संस्थानों की अभिरक्षा में रखा जाना चाहिए।
इस फैसले का क्या प्रभाव पड़ेगा?
इस निर्णय के बाद:
- मवेशी तस्करी के मामलों में आरोपियों को आसानी से जब्त पशु वापस नहीं मिल सकेंगे।
- निचली अदालतों को ऐसे मामलों में विशेष कानून का पालन करना होगा।
- पुलिस द्वारा जब्त पशुओं को पंजीकृत गौशालाओं और गोसदनों में रखा जाएगा।
- पशु संरक्षण कानून को अधिक प्रभावी तरीके से लागू करने में मदद मिलेगी।
- भविष्य में मवेशी तस्करी से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान यह फैसला एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला मवेशी तस्करी के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है। अदालत ने साफ कर दिया है कि कृषि उपयोगी पशुओं की सुरक्षा सर्वोपरि है और मुकदमे के अंतिम निर्णय तक जब्त पशुओं को आरोपी, वाहन चालक या कथित मालिक को सुपुर्द नहीं किया जा सकता। इस निर्णय से पशु संरक्षण कानून को मजबूती मिलेगी और मवेशी तस्करी पर अंकुश लगाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।



