Crude Oil Market: जून में बढ़ा एशिया का कच्चे तेल का आयात, लेकिन बरकरार है संकट, पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है असर

Business Desk – वैश्विक Crude Oil Market में जून के दौरान कुछ राहत जरूर देखने को मिली है, लेकिन हालात अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। Iran और पश्चिमी देशों के बीच बढ़े भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर बना हुआ है। जून में एशियाई देशों का समुद्री मार्ग से होने वाला कच्चे तेल का आयात मई की तुलना में बढ़ा है, लेकिन यह अब भी संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर से काफी नीचे बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें, पेट्रोल-डीजल के दाम और वैश्विक सप्लाई मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करेंगी—Strait of Hormuz से तेल आपूर्ति कितनी सामान्य होती है और China कच्चे तेल की खरीदारी किस रफ्तार से बढ़ाता है।
जून में बढ़ा एशिया का कच्चे तेल का आयात
कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म Kpler के अनुमान के अनुसार, जून में एशिया का समुद्री मार्ग से कच्चे तेल का आयात बढ़कर 2.07 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहने की संभावना है। मई में यह आंकड़ा 2.03 करोड़ बैरल प्रतिदिन था, जबकि अप्रैल में यह घटकर 1.87 करोड़ बैरल प्रतिदिन पर पहुंच गया था।
अप्रैल का स्तर नवंबर 2015 के बाद का सबसे निचला स्तर माना गया। मई और जून में कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन यह अभी भी उस सामान्य स्तर से काफी कम है जो ईरान से जुड़े तनाव शुरू होने से पहले देखने को मिल रहा था।
संघर्ष शुरू होने से पहले के तीन महीनों में एशिया का औसत समुद्री कच्चे तेल आयात लगभग 2.67 करोड़ बैरल प्रतिदिन था, जिससे साफ है कि बाजार अब भी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौटा है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा जोखिम
विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक तेल बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता अभी भी हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना हुआ है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है।
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई इसी समुद्री रास्ते से होती है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के दौरान इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी।
हालांकि दोनों देशों के बीच फिलहाल युद्धविराम की स्थिति है, लेकिन समुद्री परिवहन अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है। कुछ जहाजों पर हमलों और सुरक्षा संबंधी घटनाओं के बाद शिपिंग कंपनियां और बीमा कंपनियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं, जिससे माल ढुलाई की लागत भी प्रभावित हुई है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्यों बना हुआ है दबाव?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है।
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा हो गया था। इसके कारण कई देशों की रिफाइनरियों ने ऊंचे दामों पर कच्चा तेल खरीदा।
हालांकि अब Brent Crude की कीमतें संघर्ष से पहले के स्तर के करीब लौट आई हैं, लेकिन एशियाई बाजारों में पेट्रोल, डीजल और अन्य रिफाइंड उत्पाद अभी भी अपेक्षाकृत महंगे बने हुए हैं। इसकी वजह यही है कि रिफाइनरियां पहले खरीदे गए महंगे कच्चे तेल को अब प्रोसेस कर बाजार में बेच रही हैं।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला बदलाव घरेलू ईंधन बाजार पर भी असर डाल सकता है।
यदि वैश्विक कीमतों में दोबारा तेजी आती है या सप्लाई बाधित होती है, तो भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि अंतिम खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अलावा टैक्स, विनिमय दर और सरकारी नीतियों जैसे अन्य कारकों पर भी निर्भर करती हैं।
आगे किन बातों पर रहेगी बाजार की नजर?
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की दिशा मुख्य रूप से दो बड़े कारकों से तय होगी—
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति कितनी तेजी से सामान्य होती है।
- चीन कच्चे तेल की मांग और आयात में कितनी बढ़ोतरी करता है।
यदि मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव फिर बढ़ता है या तेल आपूर्ति में कोई बड़ी रुकावट आती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसका असर भारत सहित दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर भी पड़ सकता है।



