छत्तीसगढ़

डोंगरगढ़ परिक्रमा पथ विवाद: किसानों के आरोप, हाईकोर्ट की दखल, अब विरोध में उतरे भूपेश बघेल….

डोंगरगढ़। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई 55 करोड़ रुपये की परिक्रमा पथ परियोजना अब प्रदेश के सबसे चर्चित विवादों में शामिल हो गई है। शुरुआत किसानों की आपत्तियों से हुई, फिर मामला प्रशासनिक स्तर से बढ़कर अदालत तक पहुंचा और अब यह राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। कांग्रेस सड़क पर उतर चुकी है और पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel ने भी परियोजना का खुलकर विरोध किया है।

यह विवाद अब केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें निजी भूमि अधिग्रहण, सरकारी धन के उपयोग, प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता और जनहित जैसे कई गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

क्या है परिक्रमा पथ परियोजना?

डोंगरगढ़ धार्मिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने परिक्रमा पथ निर्माण की योजना बनाई, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।

परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 55 करोड़ रुपये बताई गई है। लेकिन परियोजना शुरू होने के साथ ही कई किसानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

किसानों का सबसे बड़ा आरोप

प्रभावित किसानों का कहना है कि परिक्रमा पथ के लिए उनकी निजी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, जबकि आसपास पर्याप्त शासकीय भूमि उपलब्ध है। उनका दावा है कि यदि सरकारी भूमि से मार्ग निकाला जा सकता है तो निजी जमीन लेने की आवश्यकता ही नहीं है।

किसानों का आरोप है कि उनकी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया और वैकल्पिक मार्ग के सुझावों को भी नजरअंदाज किया गया।

प्रशासन पर उठ रहे सवाल

इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण प्रश्न लगातार उठ रहे हैं—

  • यदि सरकारी भूमि उपलब्ध थी तो निजी भूमि अधिग्रहण क्यों किया गया?
  • क्या वैकल्पिक मार्गों का तकनीकी अध्ययन कराया गया था?
  • यदि कराया गया तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
  • क्या परियोजना की लागत का स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ?
  • निर्णय प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं, जिससे विवाद लगातार बढ़ता गया।

हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

भूमि अधिग्रहण और परियोजना को लेकर विवाद बढ़ने के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया। अदालत में परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं को चुनौती दी गई है।

न्यायालय की दखल के बाद यह मामला केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी जांच का विषय भी बन गया है।

कांग्रेस का आंदोलन

परियोजना के विरोध में कांग्रेस ने डोंगरगढ़ में प्रदर्शन किया और चक्काजाम भी किया। पार्टी का आरोप है कि किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीन ली जा रही है और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है।

कांग्रेस नेताओं ने सरकार से परियोजना की समीक्षा कराने और किसानों की मांगों पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

भूपेश बघेल भी विरोध में

अब पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel भी इस विवाद में खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने किसानों के पक्ष में आवाज उठाते हुए परियोजना की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

उनके इस रुख के बाद यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में भी प्रमुख विषय बन गया है।

वित्तीय अनियमितता पर भी उठे सवाल

परियोजना को लेकर कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाए हैं कि क्या 55 करोड़ रुपये की लागत उचित है और क्या कम खर्च में वैकल्पिक समाधान संभव था।

हालांकि, अब तक किसी भी जांच एजेंसी ने परियोजना में भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता की पुष्टि नहीं की है। इसलिए इस स्तर पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

फिर भी लगातार उठ रही आपत्तियों और बढ़ते विवाद के बीच स्वतंत्र तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय ऑडिट की मांग तेज होती जा रही है।

स्वतंत्र जांच की मांग क्यों?

विशेषज्ञों और विरोध कर रहे पक्षों का कहना है कि यदि स्वतंत्र जांच कराई जाती है तो कई सवालों के जवाब स्पष्ट हो सकते हैं।

यदि जांच में यह सामने आता है कि—

  • सरकारी भूमि उपलब्ध होने के बावजूद निजी भूमि का अनावश्यक अधिग्रहण किया गया,
  • परियोजना की लागत आवश्यकता से अधिक रखी गई,
  • या निर्णय प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं,

तो यह सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर मामला बन सकता है।

वहीं यदि जांच में पूरी प्रक्रिया नियमानुसार और जनहित में पाई जाती है, तो प्रशासन पर लगे आरोप स्वतः कमजोर पड़ जाएंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल

डोंगरगढ़ परिक्रमा पथ विवाद अब केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि सड़क बनेगी या नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या 55 करोड़ रुपये की इस परियोजना का हर निर्णय पूरी पारदर्शिता और जनहित को ध्यान में रखकर लिया गया?

इसका अंतिम उत्तर राजनीतिक बयानबाजी या प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया, स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक दस्तावेजों के आधार पर ही सामने आएगा। फिलहाल मामला किसानों के विरोध, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और न्यायालय की निगरानी के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।

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