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Rupee at All Time Low: तेल, डॉलर और FII बिकवाली के तिहरे दबाव में रुपया 93.94 पर लुढ़का…

रुपये में आज आई गिरावट कोई एक दिन की isolated घटना नहीं है; यह तेल, डॉलर और पूंजी निकासी—तीनों दबावों का मिला-जुला असर है। सोमवार, 23 मार्च 2026 को शुरुआती कारोबार में रुपया 41 पैसे टूटकर 93.94 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। शुक्रवार को यह 93.53 पर बंद हुआ था, और उससे पहले ही 93 का स्तर पहली बार टूट चुका था।

सबसे बड़ा कारण है कच्चे तेल की तेज उछाल। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए जब ब्रेंट क्रूड करीब 113 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचता है, तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है। अभी पश्चिम एशिया के तनाव और सप्लाई बाधित होने के डर ने तेल बाजार को झटका दिया है; Reuters के मुताबिक तेल इस महीने लगभग 50% तक उछला है। यह सीधे रुपये पर दबाव डालता है, क्योंकि भारत को ज्यादा महंगे डॉलर देकर तेल खरीदना पड़ता है।

दूसरा बड़ा कारण है डॉलर की मजबूती। वैश्विक तनाव बढ़ने पर निवेशक आम तौर पर जोखिम वाले एसेट्स छोड़कर डॉलर जैसी safe-haven assets की तरफ भागते हैं। इसी वजह से डॉलर इंडेक्स सोमवार को करीब 99.77 के आसपास मजबूत बना रहा। जब डॉलर मजबूत होता है, तो उभरते बाजारों की मुद्राओं—जिसमें रुपया भी शामिल है—पर दबाव बढ़ जाता है।

तीसरा अहम फैक्टर है विदेशी निवेशकों की बिकवाली। Reuters के मुताबिक, पश्चिम एशिया युद्ध शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से करीब 9.5–9.6 अरब डॉलर निकाले हैं। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेचते हैं, तो वे पैसे बाहर ले जाने के लिए रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं। इससे भी रुपये की कमजोरी तेज होती है। इसी दबाव का असर शेयर बाजार पर भी दिखा, जहाँ Nifty 50 करीब 2.2% और Sensex करीब 2.13% नीचे गए।

इसके अलावा एक और चीज चल रही है—importers और oil companies की hedging demand। जब बाजार को डर होता है कि डॉलर और महंगा हो सकता है, तो आयातक पहले से ज्यादा डॉलर खरीदकर अपनी future payments secure करते हैं। इससे spot market में डॉलर की मांग और बढ़ जाती है, और रुपया और दबाव में आ जाता है। Reuters ने भी importer hedging को मौजूदा कमजोरी का एक कारण बताया है।

भारत पर इसका असर कई लेयर में दिख सकता है। पहला, import bill बढ़ेगा। दूसरा, पेट्रोल-डीजल, एविएशन फ्यूल, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे हो सकते हैं। तीसरा, इन लागतों का असर महंगाई पर पड़ सकता है। चौथा, अगर तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहा, तो current account deficit और bond yields पर भी दबाव बना रह सकता है। Reuters के मुताबिक भारत का 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड भी ऊपर गया है, जो broader financial stress का संकेत है।

एक छोटी-सी राहत वाली बात भी है: Reuters के अनुसार RBI की दखलअंदाजी ने रुपये की गिरावट को कुछ हद तक थामे रखा है, वरना दबाव और बड़ा दिख सकता था। लेकिन जब तक तेल, डॉलर और geopolitics तीनों एक साथ against हों, तब तक रुपये में volatility बनी रह सकती है। Bank of America ने भी अब जून 2026 तक रुपये के लिए 94 का अनुमान दिया है, जो बताता है कि बाजार अभी जल्दी राहत की उम्मीद नहीं कर रहा।

आसान भाषा में कहें, तो मामला यह है:
तेल महंगा → भारत को ज्यादा डॉलर चाहिए → डॉलर मजबूत → विदेशी पैसा बाहर → रुपया कमजोर।
अभी यही चक्र रुपये को रिकॉर्ड लो की तरफ धकेल रहा है।

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