
इस मामले में हाईकोर्ट की नाराज़गी सिर्फ सीटें कम होने पर नहीं है, बल्कि सरकार के जवाब, आंकड़ों की पारदर्शिता और निजी स्कूलों की जवाबदेही—तीनों पर है। अगर इसे आसान भाषा में समझें, तो कोर्ट यह जानना चाहता है कि RTE (Right to Education) के तहत गरीब और वंचित बच्चों के लिए जो 25% आरक्षित सीटें हैं, वे वास्तव में घटाई गई हैं या सिर्फ “गिनती का तरीका” बदला गया है। इसी वजह से अदालत ने राज्य सरकार से साफ-साफ और बिंदुवार जवाब मांगा है।
पूरा मामला क्या है?
छत्तीसगढ़ में आरटीई के तहत निजी स्कूलों में कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को 25% सीटों पर मुफ्त प्रवेश दिया जाता है। पहले जिन सीटों की संख्या करीब 85 हजार बताई जा रही थी, अब वही संख्या घटकर लगभग 55 हजार के आसपास दिखाई देने लगी। इसी पर हाईकोर्ट ने पूछा—“जब आरक्षण का प्रावधान वही है, तो सीटें अचानक 30 हजार कैसे कम हो गईं?” यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि इसका सीधा असर हजारों बच्चों के प्रवेश पर पड़ता है।

सरकार ने क्या सफाई दी?
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि 2026-27 सत्र से प्री-प्राइमरी (नर्सरी/केजी) स्तर पर RTE के तहत नए प्रवेश नहीं दिए जाएंगे, क्योंकि सरकार का तर्क है कि RTE कानून 6 से 14 वर्ष के बच्चों पर लागू होता है।
सरकार ने अपने हलफनामे में यह गणित रखा:
- पिछले सत्र के 35,335 बच्चे अब अगली कक्षा/कक्षा 1 में जाएंगे
- नए सत्र में 19,540 नए बच्चों को प्रवेश दिया जाएगा
- इस तरह कुल 54,875 छात्रों को RTE का लाभ मिलेगा
यानी सरकार का कहना है कि सीटें “कम” नहीं हुईं, बल्कि पात्रता और प्रवेश स्तर बदलने से आंकड़ा अलग दिख रहा है।
फिर कोर्ट क्यों नाराज़ हुआ?
क्योंकि अदालत को लगा कि सरकार की तरफ से दिया गया जवाब पूरी तरह स्पष्ट और भरोसेमंद नहीं है।
1) 85 हजार से 55 हजार तक आने का ठोस हिसाब नहीं दिया गया
कोर्ट सिर्फ कुल संख्या नहीं, बल्कि यह जानना चाहता है:
- पहले 85 हजार का आंकड़ा किस आधार पर बना?
- उसमें प्री-प्राइमरी सीटें शामिल थीं या नहीं?
- अब जो 54,875 बताया जा रहा है, वह सिर्फ कक्षा 1 से 8 तक है या उसमें अन्य स्तर भी जुड़े हैं?
- निजी स्कूलों की कुल सीटों का 25% कैलकुलेशन जिला-दर-जिला क्या है?
यानी अदालत को सिर्फ “संख्या” नहीं, बल्कि सीट निर्धारण का पूरा फॉर्मूला चाहिए।
2) हलफनामे में विरोधाभास मिला
सरकार ने कहा कि दुर्ग जिले की 118 शिकायतों में से 77 का निपटारा कर दिया गया है।
लेकिन कोर्ट के सामने जो रिकॉर्ड आया, उसमें सिर्फ 7 शिकायतों के निराकरण का आधार दिखा।
यहीं अदालत को सबसे ज्यादा समस्या हुई। क्योंकि जब सरकारी हलफनामे और वास्तविक दस्तावेजों में इतना अंतर हो, तो कोर्ट स्वाभाविक रूप से पूछेगा—“सच कौन सा है?”
सचिव की जगह संयुक्त सचिव ने हलफनामा क्यों दिया?
पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा देने को कहा था।
लेकिन इस बार राज्य ने बताया कि सचिव चुनाव आयोग की ड्यूटी के कारण असम में तैनात हैं, इसलिए उनकी जगह संयुक्त सचिव ने 21 मार्च को हलफनामा दिया।
कोर्ट ने इसे रिकॉर्ड पर तो ले लिया, लेकिन जवाब की गुणवत्ता पर असंतोष जताया। अदालत का संकेत साफ था—इतने गंभीर मामले में “औपचारिक” जवाब नहीं चलेगा।
प्री-प्राइमरी को RTE से बाहर करने का विवाद इतना बड़ा क्यों है?
यही इस पूरे केस का सबसे अहम कानूनी और सामाजिक मुद्दा है।
सरकार का पक्ष:
- RTE Act का मुख्य दायरा 6–14 वर्ष है
- इसलिए नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी को RTE कोटे में शामिल करना जरूरी नहीं
अभिभावकों/याचिकाकर्ताओं की चिंता:
- ज्यादातर निजी स्कूलों में वास्तविक प्रवेश नर्सरी/केजी से शुरू होता है
- अगर बच्चे को उस स्तर पर मौका नहीं मिला, तो बाद में कक्षा 1 में प्रवेश practically मुश्किल हो जाता है
- इससे गरीब बच्चों के लिए “समान अवसर” कागज पर रह जाएगा
यानी कानूनी बहस सिर्फ उम्र की नहीं, बल्कि शिक्षा तक वास्तविक पहुंच की है।
निजी स्कूलों पर क्या आरोप लगे?
सुनवाई के दौरान सिर्फ सीटों का मुद्दा नहीं उठा, बल्कि कई निजी स्कूलों की गंभीर अनियमितताएँ भी कोर्ट के सामने रखी गईं। आरोप यह हैं कि कुछ स्कूल:
- CBSE affiliation का गलत दावा कर रहे हैं
- पूरे साल बच्चों को होम एग्जाम/आंतरिक प्रणाली से पढ़ाकर बाद में अचानक बोर्ड पैटर्न थोप देते हैं
- मनमाने तरीके से फीस बढ़ाते हैं
- और जब अभिभावक विरोध करते हैं, तो उन्हें धमकाया जाता है
इन आरोपों को अदालत ने गंभीरता से लिया, क्योंकि यह सिर्फ फीस का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में धोखे और दबाव का मामला बनता है।
हाईकोर्ट का रुख क्या बताता है?
हाईकोर्ट फिलहाल यह संकेत दे रहा है कि:
- RTE सीटों का वास्तविक डेटा सामने आना चाहिए
- निजी स्कूलों की मान्यता, फीस, प्रवेश और व्यवहार पर सख्त निगरानी हो
- और राज्य सरकार सिर्फ कागजी जवाब देकर नहीं बच सकती
यानी अदालत का फोकस दो स्तर पर है:
(A) Policy level
क्या राज्य ने RTE की भावना के खिलाफ जाकर सीटें “व्यवहारिक रूप से” कम कर दीं?
(B) Ground level
क्या निजी स्कूल गरीब बच्चों और अभिभावकों के साथ नियमों के खिलाफ व्यवहार कर रहे हैं?
8 अप्रैल की अगली सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
अगली तारीख 8 अप्रैल 2026 इसलिए अहम है, क्योंकि तब तक अदालत ने राज्य सरकार से कहा है कि वह:
- सभी बिंदुओं पर विस्तृत हलफनामा दे
- लंबित मामलों में स्पष्ट जवाब दाखिल करे
- और शिकायतों के निपटारे पर विश्वसनीय रिकॉर्ड प्रस्तुत करे
अगर अगली सुनवाई में भी जवाब अस्पष्ट रहा, तो कोर्ट और सख्त रुख अपना सकता है—जैसे व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना, विस्तृत डेटा मंगाना, या स्कूलों के खिलाफ निगरानी/कार्रवाई के आदेश देना।
आम लोगों और अभिभावकों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस केस का असर सीधे उन परिवारों पर है जो हर साल RTE के जरिए बच्चों का प्रवेश चाहते हैं। अगर सीटें कम होती हैं या नियम अस्पष्ट रहते हैं, तो:
- हजारों बच्चों का एडमिशन प्रभावित होगा
- निजी स्कूलों की मनमानी बढ़ेगी
- और गरीब परिवारों के लिए “अच्छे स्कूल” तक पहुंच और मुश्किल होगी
इसलिए यह मामला सिर्फ कोर्टरूम की बहस नहीं, बल्कि शिक्षा में बराबरी के अधिकार का मामला है।
एक लाइन में निष्कर्ष
हाईकोर्ट का मुख्य सवाल यह है:
“अगर RTE के तहत 25% आरक्षण बना हुआ है, तो फिर सीटों की संख्या कम क्यों दिख रही है—और क्या यह बदलाव कानूनी, पारदर्शी और बच्चों के हित में है?”
और अभी तक राज्य सरकार उस सवाल का पूरी तरह संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई है।



