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पद्मश्री डॉ. तीजन बाई को आज अंतिम विदाई, गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार..

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली प्रख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई के निधन के बाद पूरे प्रदेश में शोक की लहर है। रविवार सुबह रायपुर से उनका पार्थिव शरीर दुर्ग जिले के उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

परिजनों के अनुसार, सुबह करीब 11:30 बजे पार्थिव शरीर को अंतिम यात्रा के लिए मुक्ति धाम ले जाया जाएगा। अंतिम दर्शन और विदाई के लिए उनके शिष्य, ग्रामीण, लोक कलाकार, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु गनियारी पहुंच रहे हैं। गांव में हर ओर गमगीन माहौल है और नम आंखों से लोग अपनी प्रिय लोक कलाकार को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ रहे हैं।

अंतिम संस्कार को लेकर जिला प्रशासन ने व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। गनियारी में दुर्ग कलेक्टर, दुर्ग एसएसपी सहित वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौजूद हैं। राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की सभी औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।

38 दिनों तक चला इलाज, एम्स में ली अंतिम सांस

डॉ. तीजन बाई पिछले लगभग 38 दिनों से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान रायपुर में भर्ती थीं, जहां उनका इलाज चल रहा था। लंबे उपचार के बावजूद रविवार सुबह 72 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही कला जगत, राजनीतिक क्षेत्र और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई।

मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल ने दी श्रद्धांजलि

डॉ. तीजन बाई के निधन की सूचना मिलते ही मुख्यमंत्री विष्णु देव साय मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ एम्स पहुंचे और उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री ने शोक संतप्त परिजनों से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर थीं तीजन बाई

डॉ. तीजन बाई ने अपनी दमदार प्रस्तुति और अनूठी शैली से पंडवानी लोकगायन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। उन्होंने महाभारत की कथाओं को लोकभाषा और लोकशैली में प्रस्तुत कर लाखों लोगों का दिल जीता। कला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।

उनके निधन से केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की लोक कला और सांस्कृतिक जगत ने अपनी एक अमूल्य धरोहर खो दी है। उनकी आवाज, उनकी कला और पंडवानी परंपरा को समृद्ध करने में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।

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