महाशिवरात्रि 2026 : गरियाबंद का भूतेश्वरनाथ महादेव – हर साल बढ़ता है इस शिवलिंग का आकार, आस्था और विज्ञान दोनों के लिए रहस्य

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर पूरे देश में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जा रही है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले में स्थित भूतेश्वरनाथ मंदिर इस पर्व पर विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है। यहां स्थित प्राकृतिक शिवलिंग को दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक शिवलिंग माना जाता है, जिसकी सबसे अनोखी विशेषता है—इसका हर साल बढ़ता हुआ आकार।

प्रकृति प्रदत्त शिवलिंग, जिसे स्वयंभू मानते हैं श्रद्धालु
भूतेश्वरनाथ महादेव का यह शिवलिंग किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से धरती से प्रकट हुआ है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव इस पवित्र स्थान पर शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। यही कारण है कि महाशिवरात्रि, सावन और अन्य शिव पर्वों पर यहां हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
यह शिवलिंग खुले आकाश के नीचे स्थित है, जो इसे और भी रहस्यमय और विशेष बनाता है।
हर साल बढ़ रहा है शिवलिंग का आकार – वैज्ञानिकों के लिए भी रहस्य
इस शिवलिंग की सबसे चौंकाने वाली बात इसका लगातार बढ़ता हुआ आकार है।
मौजूदा अनुमानित आकार:
- ऊंचाई: लगभग 18 फीट
- गोलाई (चौड़ाई): लगभग 20 फीट
पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए निरीक्षणों के अनुसार, यह शिवलिंग हर वर्ष लगभग 6 से 8 इंच तक बढ़ता है।
यह घटना वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बनी हुई है। कुछ विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया मानते हैं, जबकि श्रद्धालु इसे भगवान शिव का चमत्कार मानते हैं।
अर्धनारीश्वर रूप में होती है पूजा
इस शिवलिंग की सतह पर एक हल्की दरार दिखाई देती है, जिसे श्रद्धालु शिव और शक्ति का प्रतीक मानते हैं। इसी कारण यहां शिवलिंग की पूजा अर्धनारीश्वर स्वरूप में की जाती है, जिसमें माता पार्वती और भगवान शिव एक ही रूप में माने जाते हैं।
शिवलिंग के पीछे स्थापित प्रतिमा में भगवान शिव अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं, जिसमें शामिल हैं:
- भगवान गणेश
- भगवान कार्तिकेय
- नंदी
यह दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत श्रद्धा और आस्था का केंद्र है।
भकुर्रा महादेव नाम की भी है विशेष मान्यता
भूतेश्वरनाथ महादेव को स्थानीय लोग “भकुर्रा महादेव” भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में “भकुर्रा” का अर्थ होता है हुंकार या गूंजती आवाज।
मान्यता है कि प्राचीन समय में यहां से बैल की आवाज, शेर की दहाड़ और रहस्यमयी ध्वनियां सुनाई देती थीं। इसी कारण लोगों ने इस स्थान को दिव्य और शिव का स्वरूप मानकर पूजा शुरू कर दी।
उत्पत्ति से जुड़ी प्राचीन लोककथा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, जमींदारी काल में पारागांव के जमींदार शोभा सिंह यहां खेती करते थे। एक दिन उन्हें खेत के पास एक टीले से बैल और शेर की आवाज सुनाई दी। जब ग्रामीणों ने खोजबीन की तो कोई जानवर नहीं मिला।
इसके बाद ग्रामीणों ने उस स्थान को दिव्य मानकर पूजा शुरू कर दी। धीरे-धीरे यह स्थान भूतेश्वरनाथ महादेव के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
महाशिवरात्रि पर लगता है विशाल मेला
महाशिवरात्रि के दिन यहां विशेष आयोजन होता है:
- हजारों श्रद्धालु जल और दूध से अभिषेक करते हैं
- रातभर भजन-कीर्तन चलता है
- भक्त व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करते हैं
- दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं
इस दिन पूरे क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का अनूठा माहौल रहता है।
आस्था और विज्ञान का अनोखा संगम
भूतेश्वरनाथ महादेव का शिवलिंग आज भी एक रहस्य बना हुआ है।
- श्रद्धालुओं के लिए यह भगवान शिव का जीवंत चमत्कार है
- वैज्ञानिकों के लिए यह प्राकृतिक प्रक्रिया का अनोखा उदाहरण है
लेकिन एक बात निश्चित है—यह स्थान छत्तीसगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।



