
डोंगरगढ़। चैत्र नवरात्र 2026 के समापन पर छत्तीसगढ़ की आस्था नगरी Dongargarh एक बार फिर भक्ति, परंपरा और अद्भुत आस्था के रंग में सराबोर नजर आई। मां बम्लेश्वरी मंदिर से निकली ज्योति विसर्जन शोभायात्रा ने पूरे शहर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। यह यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए ऐतिहासिक महावीर तालाब पहुंची, जहां हजारों ज्योति कलशों का विधि-विधान और श्रद्धा के साथ विसर्जन किया गया।
इस दौरान जो दृश्य सामने आया, उसने हर किसी को भावुक कर दिया। सिर पर ज्योति कलश धारण किए सैकड़ों महिलाएं, हाथों में श्रद्धा और चेहरे पर भक्ति का तेज लिए जब शोभायात्रा में आगे बढ़ीं, तो पूरा डोंगरगढ़ “जय मां बम्लेश्वरी” के जयकारों से गूंज उठा। ढोल-नगाड़ों की थाप, देवी गीतों की मधुर स्वर लहरियां और भक्तों की अपार आस्था ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

नौ दिनों की साधना के बाद निकली पवित्र ज्योति यात्रा
चैत्र नवरात्र के नौ दिनों तक भक्तों द्वारा पूजित ज्योति कलश को बड़े श्रद्धाभाव से विसर्जन के लिए निकाला गया। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मां बम्लेश्वरी के प्रति अटूट विश्वास, परंपरा और सामूहिक आस्था का विराट उत्सव बनकर सामने आया।
शोभायात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ी, शहर की गलियां, सड़कें और चौक-चौराहे भक्तों की भीड़, देवी भजनों और जयकारों से जीवंत हो उठे। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोग इस पावन अवसर के साक्षी बने।

जब आस्था के सम्मान में थम गई ट्रेनों की रफ्तार
इस परंपरा का सबसे अद्भुत और ऐतिहासिक दृश्य उस समय सामने आया, जब ज्योति विसर्जन शोभायात्रा मुंबई–हावड़ा मुख्य रेल मार्ग को पार करने पहुंची। आम दिनों में जहां इस रेलवे ट्रैक पर ट्रेनों की रफ्तार लगातार बनी रहती है, वहीं ज्योति विसर्जन के समय आस्था के सम्मान में रेल यातायात कुछ देर के लिए थम गया।
श्रद्धालुओं की सुरक्षित आवाजाही और परंपरा के निर्वहन के लिए रेलवे लाइन पर मेगा ब्लॉक लगाया गया, जिसके चलते दोनों ओर से आने-जाने वाली ट्रेनों के पहिए कुछ समय के लिए रुक गए। पटरियों पर पसरा वह सन्नाटा और दूसरी ओर भक्तों की उमड़ी आस्था का दृश्य, डोंगरगढ़ की धार्मिक परंपरा की गहराई को बयां कर रहा था।
यह नजारा अपने आप में अनूठा था—जहां एक ओर आधुनिकता और रफ्तार का प्रतीक रेल मार्ग था, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी आस्था, जिसे सम्मान देने के लिए व्यवस्था भी ठहर गई।
अंग्रेजों के दौर से चली आ रही है यह अनोखी परंपरा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, डोंगरगढ़ की यह परंपरा अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। बताया जाता है कि जब इस क्षेत्र में रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी, तब खैरागढ़ राजपरिवार ने यह शर्त रखी थी कि मां बम्लेश्वरी की ज्योति विसर्जन शोभायात्रा के दौरान ट्रेनों को रोका जाएगा, ताकि परंपरा और धार्मिक आस्था बाधित न हो।
वर्षों बीत जाने के बाद भी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है। यही वजह है कि डोंगरगढ़ का यह आयोजन सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और जनआस्था का जीवंत दस्तावेज बन चुका है।
मां बम्लेश्वरी और मां शीतला की ज्योत का हुआ प्रतीकात्मक मिलन
रेलवे ट्रैक पार करने के बाद शोभायात्रा मां शीतला मंदिर पहुंची, जहां मां बम्लेश्वरी और मां शीतला की ज्योत का प्रतीकात्मक मिलन कराया गया। यह क्षण श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक अनुभूति से भरपूर रहा।
इस दौरान मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में उपस्थित भक्तों ने मां के जयकारों, पूजा-अर्चना और आरती के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित की। भक्तों के लिए यह पल केवल धार्मिक विधि नहीं, बल्कि मां के साक्षात आशीर्वाद का अनुभव जैसा था।
महावीर तालाब में विधि-विधान से हुआ ज्योति कलश विसर्जन
इसके बाद शोभायात्रा महावीर तालाब पहुंची, जहां हजारों ज्योति कलशों का पारंपरिक विधि-विधान के साथ विसर्जन किया गया। श्रद्धालुओं ने पूरे भक्ति भाव से मां की ज्योति को जल में प्रवाहित किया और सुख, समृद्धि, शांति और परिवार के मंगल की कामना की।
विसर्जन के इस भावुक क्षण के दौरान पूरा वातावरण “जय मां बम्लेश्वरी” के जयकारों से गूंज उठा। भक्तों की आंखों में आस्था, चेहरे पर संतोष और मन में मां के प्रति गहरी श्रद्धा स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, सामाजिक एकता का भी प्रतीक
डोंगरगढ़ का यह ज्योति विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक श्रद्धा का विराट उदाहरण भी है। इस आयोजन में समाज के हर वर्ग, हर आयु और हर समुदाय के लोग एक साथ शामिल होते हैं, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा को दर्शाता है।
यह आयोजन यह भी बताता है कि परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं, उन्हें जिया जाता है। डोंगरगढ़ की यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी वर्षों पहले थी।
डोंगरगढ़ ने फिर दिखाया—आस्था आज भी सबसे बड़ी शक्ति है
चैत्र नवरात्र के इस समापन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि डोंगरगढ़ केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि आस्था की जीवंत राजधानी है। यहां मां के प्रति भक्तों का विश्वास इतना गहरा है कि उसके आगे आधुनिक रफ्तार भी कुछ क्षणों के लिए थम जाती है।
डोंगरगढ़ की यह ज्योति विसर्जन यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह संदेश छोड़ती है कि जब परंपरा, श्रद्धा और सामूहिक विश्वास एक साथ खड़े होते हैं, तो समय भी सम्मान में ठहर जाता है।



