
जिला अस्पताल में एंटी-रेबीज और टिटनेस इंजेक्शन की कमी पर हाईकोर्ट सख्त
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला अस्पताल में एंटी-रेबीज (कुत्ता/बंदर/जानवर काटने पर लगने वाला इंजेक्शन) और टिटनेस इंजेक्शन की कथित कमी के मामले को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। अदालत ने सिर्फ मौखिक भरोसे पर बात मानने के बजाय जमीनी हकीकत जानने के लिए सख्त कदम उठाए हैं।

इस मामले में हाईकोर्ट ने:
- कोर्ट कमिश्नर को अस्पताल भेजने का आदेश दिया
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव से नया शपथपत्र मांगा
- और कहा कि मामले की फिर से सुनवाई 8 अप्रैल को होगी
यानी अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अस्पताल में दवाइयों और जरूरी इंजेक्शनों की उपलब्धता को लेकर सच क्या है।
मामला क्या है?
यह पूरा मामला उस खबर के बाद उठा, जिसमें कहा गया था कि बिलासपुर जिला अस्पताल में एंटी-रेबीज और टिटनेस इंजेक्शन की कमी है।
ये दोनों इंजेक्शन बेहद जरूरी माने जाते हैं:
1) एंटी-रेबीज इंजेक्शन
यह इंजेक्शन तब लगाया जाता है जब किसी व्यक्ति को:
- कुत्ता
- बंदर
- बिल्ली
- या कोई दूसरा संक्रमित जानवर काट ले
रेबीज एक जानलेवा बीमारी है। अगर समय पर इलाज न मिले, तो मरीज की जान तक जा सकती है।
2) टिटनेस इंजेक्शन
यह इंजेक्शन तब जरूरी होता है जब:
- किसी को गहरी चोट लग जाए
- जंग लगी चीज से कट जाए
- सड़क हादसा हो
- या शरीर में संक्रमण का खतरा हो
इसलिए अगर अस्पताल में इन इंजेक्शनों की कमी होती है, तो यह सीधा जनता की सेहत और जान से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच (DB) में सुना गया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि:
बिलासपुर जिला अस्पताल में एंटी-रेबीज और टिटनेस इंजेक्शन की कमी को लेकर अखबार में जो खबर छपी है, वह गलत / असत्य है।
यानी सरकार की तरफ से यह कहा गया कि अस्पताल में इंजेक्शन की कमी वाली बात सही नहीं है।
सरकार ने कोर्ट में क्या दस्तावेज पेश किए?
राज्य के अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने 05.04.2026 के निर्देशों की एक प्रति पेश की।
यह निर्देश छत्तीसगढ़ शासन के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को भेजे गए थे।
इसका मतलब यह है कि सरकार ने अदालत को यह दिखाने की कोशिश की कि:
- मामले को नोटिस में लिया गया है
- विभाग को निर्देश दिए जा चुके हैं
- और स्थिति को लेकर प्रशासन सक्रिय है
लेकिन अदालत ने सिर्फ कागजों के आधार पर बात खत्म नहीं की।
हाईकोर्ट ने सिर्फ कागजों पर भरोसा क्यों नहीं किया?
कोर्ट ने साफ कहा कि वास्तविक स्थिति जानना जरूरी है।
अदालत ने यह माना कि:
- सरकार कुछ आंकड़े और दस्तावेज दे रही है
- लेकिन अस्पताल में जमीनी स्तर पर असल में क्या हाल है, यह अलग बात है
- इसलिए सच्चाई का स्वतंत्र सत्यापन जरूरी है
यही वजह है कि कोर्ट ने एक स्वतंत्र जांच जैसी प्रक्रिया अपनाई।
कोर्ट कमिश्नर को अस्पताल भेजने का आदेश
हाईकोर्ट ने न्यायालय आयुक्त (Court Commissioner) पलाश तिवारी को आदेश दिया कि:
वे उसी दिन बिलासपुर जिला अस्पताल का दौरा करें और वहां की स्थिति की रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें।
इस आदेश का मतलब बहुत महत्वपूर्ण है।
इसका सीधा अर्थ:
कोर्ट खुद यह जानना चाहती है कि:
- अस्पताल में एंटी-रेबीज इंजेक्शन उपलब्ध हैं या नहीं
- टिटनेस इंजेक्शन मौजूद हैं या नहीं
- मरीजों को इलाज में दिक्कत हो रही है या नहीं
- और अस्पताल प्रशासन जो कह रहा है, वह जमीन पर सही है या नहीं
यानी अदालत ने “सुनवाई के बजाय सच्चाई” को प्राथमिकता दी है।
स्वास्थ्य सचिव से शपथपत्र क्यों मांगा गया?
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई।
हाईकोर्ट ने बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को पहले ही 11 फरवरी 2026 के आदेश के पालन में एक शपथपत्र (Affidavit) दाखिल करने को कहा गया था।
शपथपत्र क्या होता है?
शपथपत्र यानी एक ऐसा लिखित बयान जो कानूनी जिम्मेदारी और शपथ के साथ कोर्ट में दिया जाता है।
इसका मतलब:
- जो जानकारी दी जाएगी, वह आधिकारिक और जवाबदेही वाली मानी जाएगी
- गलत जानकारी देने पर अधिकारी जवाबदेह हो सकता है
शपथपत्र में क्या गड़बड़ी हुई?
हाईकोर्ट ने पाया कि जो शपथपत्र कोर्ट में दाखिल किया गया, उसमें तारीख की गलती थी।
गलती क्या थी?
जहां 11.02.2026 के आदेश का पालन दिखाना था, वहां गलती से 12.12.2026 लिख दिया गया।
यह एक टाइपिंग/प्रशासनिक त्रुटि लग सकती है, लेकिन अदालत में ऐसी गलती को हल्के में नहीं लिया जाता।
क्योंकि:
- कोर्ट रिकॉर्ड में हर तारीख और आदेश की अहमियत होती है
- गलत तारीख से कानूनी स्थिति भ्रमित हो सकती है
- इससे यह भी लगता है कि अधिकारी ने दस्तावेज को गंभीरता से नहीं तैयार किया
हाईकोर्ट ने इस गलती पर क्या कहा?
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि:
11.02.2026 के आदेश के अनुपालन में नया और सही शपथपत्र दाखिल किया जाए।
यानी अदालत ने स्वास्थ्य सचिव को दोबारा सही, स्पष्ट और कानूनी रूप से ठीक एफिडेविट पेश करने को कहा है।
इससे साफ है कि कोर्ट इस मामले में तकनीकी लापरवाही भी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
इस मामले में हाईकोर्ट का रुख इतना सख्त क्यों है?
क्योंकि यह मामला सिर्फ “स्टॉक खत्म” होने का नहीं है, बल्कि पब्लिक हेल्थ और इमरजेंसी मेडिकल सर्विस से जुड़ा हुआ है।
अगर जिला अस्पताल में ऐसे इंजेक्शन नहीं मिलेंगे, तो:
- डॉग बाइट पीड़ितों की जान खतरे में पड़ सकती है
- दुर्घटना या चोट वाले मरीजों को तुरंत इलाज नहीं मिलेगा
- गरीब और आम मरीजों को निजी अस्पताल या मेडिकल स्टोर के भरोसे रहना पड़ेगा
- समय पर इलाज न मिलने से संक्रमण या मौत तक का खतरा हो सकता है
यही कारण है कि अदालत इसे बहुत गंभीर जनहित का विषय मान रही है।
यह मामला आम लोगों के लिए क्यों अहम है?
बहुत से लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ अस्पताल प्रशासन या कोर्ट की प्रक्रिया है, लेकिन असल में यह मामला सीधे आम जनता की जिंदगी से जुड़ा है।
खासकर किन लोगों के लिए?
- गरीब मरीज
- गांव और कस्बों से आने वाले लोग
- सरकारी अस्पताल पर निर्भर परिवार
- डॉग बाइट या चोट के मरीज
- बच्चे और बुजुर्ग
अगर जिला अस्पताल में ऐसे बेसिक लेकिन जरूरी इंजेक्शन भी उपलब्ध नहीं होंगे, तो इसका असर सबसे ज्यादा गरीब वर्ग पर पड़ेगा।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है।
आगे की प्रक्रिया:
- कोर्ट कमिश्नर अस्पताल का निरीक्षण करेंगे
- वह अपनी रिपोर्ट कोर्ट में देंगे
- स्वास्थ्य सचिव नया शपथपत्र दाखिल करेंगे
- इसके बाद 8 अप्रैल को मामले की फिर से सुनवाई होगी
8 अप्रैल की सुनवाई में क्या हो सकता है?
अगली सुनवाई में कोर्ट संभवतः इन बातों पर ध्यान देगा:
- कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट क्या कहती है?
- अस्पताल में वास्तव में इंजेक्शन उपलब्ध थे या नहीं?
- सरकार और अस्पताल प्रशासन ने कोर्ट को सही जानकारी दी या नहीं?
- स्वास्थ्य विभाग ने स्थिति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए?
- क्या भविष्य में ऐसी कमी रोकने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था है?
अगर रिपोर्ट में गड़बड़ी मिलती है, तो कोर्ट सरकार या जिम्मेदार अधिकारियों पर और कड़ा रुख अपना सकता है।
आसान भाषा में पूरा निष्कर्ष
बिलासपुर जिला अस्पताल में एंटी-रेबीज और टिटनेस इंजेक्शन की कमी की खबर को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। सरकार ने कहा कि खबर गलत है, लेकिन अदालत ने सिर्फ सरकारी दावों पर भरोसा नहीं किया। कोर्ट ने स्वतंत्र जांच के लिए कोर्ट कमिश्नर को अस्पताल भेजा और स्वास्थ्य सचिव से सही शपथपत्र मांगा है।
यानी हाईकोर्ट अब यह जानना चाहती है कि:
अस्पताल में सचमुच इंजेक्शन उपलब्ध हैं या सिर्फ कागजों में सब ठीक दिखाया जा रहा है।
यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी सच्चाई को सामने ला सकता है।



