जल संरक्षण और सिंचाई विस्तार की बड़ी उपलब्धि, जीपीएम में छह गुना से अधिक बढ़ी सिंचाई क्षमता

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। इसी क्रम में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिले ने सिंचाई अधोसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। राज्य गठन के समय जहां जिले में महज 4,458 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध थी, वहीं वर्ष 2026 तक यह क्षमता बढ़कर 25,936 हेक्टेयर हो गई है।

इस तरह पिछले करीब 25 वर्षों में जिले की सिंचाई क्षमता में 21,476 हेक्टेयर की वृद्धि हुई है। यानी राज्य गठन के समय की तुलना में अब जिले में छह गुना से अधिक क्षेत्र को सिंचाई सुविधा का लाभ मिल रहा है। यह विस्तार केवल जल संसाधन विभाग की अधोसंरचना में वृद्धि नहीं, बल्कि कृषि गतिविधियों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए उपलब्ध संभावनाओं के विस्तार से भी जुड़ा हुआ है।
राज्य गठन के समय सीमित थी जल संसाधन अधोसंरचना
छत्तीसगढ़ के गठन के समय गौरेला-पेंड्रा-मरवाही क्षेत्र में सिंचाई के साधन सीमित थे। 1 नवंबर 2000 से पहले जिले में कुल 28 जल संसाधन परियोजनाएं निर्मित थीं। इनमें 17 जलाशय, 4 व्यपवर्तन योजनाएं, 2 स्टॉप डेम और 5 एनीकट शामिल थे।
इन परियोजनाओं के माध्यम से लगभग 4,458 हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई हो पाती थी। सीमित सिंचाई सुविधाओं के कारण जिले की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर थी। बारिश की स्थिति का सीधा असर खेती और कृषि गतिविधियों पर पड़ता था।
ऐसे में सिंचाई के स्थायी साधनों का विस्तार जिले के लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। जलाशयों, नहरों, एनीकट और अन्य जल संरचनाओं के विकास के माध्यम से खेतों तक पानी पहुंचाने की दिशा में धीरे-धीरे काम आगे बढ़ाया गया।
25 वर्षों में बनीं 57 नई जल संसाधन परियोजनाएं
राज्य गठन के बाद जल संसाधन विभाग ने जिले में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर चरणबद्ध तरीके से काम किया। पिछले 25 वर्षों के दौरान 57 नई जल संसाधन परियोजनाओं का निर्माण पूरा किया गया।
यदि राज्य गठन से पहले मौजूद 28 परियोजनाओं और पिछले 25 वर्षों में पूर्ण हुई 57 नई परियोजनाओं को एक साथ देखा जाए तो जिले में अब कुल 85 जल संसाधन योजनाओं का आधार तैयार हो चुका है।
नई परियोजनाओं के साथ पुरानी जल संरचनाओं की उपयोगिता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया। नहरों के जीर्णोद्धार, विस्तार और जल वितरण व्यवस्था को बेहतर बनाने के प्रयास किए गए, ताकि जलाशयों से निकलने वाला पानी अधिक से अधिक कृषि क्षेत्र तक पहुंच सके।
दूर-दराज के खेतों तक सिंचाई सुविधा पहुंचाने के लिए विभिन्न तकनीकी विकल्पों का इस्तेमाल किया गया। कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई के उद्देश्य से माइक्रो इरिगेशन और लिफ्ट इरिगेशन जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया।
4,458 हेक्टेयर से 25,936 हेक्टेयर पहुंची क्षमता
जीपीएम जिले में सिंचाई अधोसंरचना के विस्तार का सबसे बड़ा प्रभाव सिंचाई क्षमता में हुई वृद्धि के रूप में सामने आया है।
- राज्य गठन के समय सिंचाई क्षमता: 4,458 हेक्टेयर
- वर्ष 2026 में सिंचाई क्षमता: 25,936 हेक्टेयर
- कुल वृद्धि: 21,476 हेक्टेयर
- वृद्धि: राज्य गठन के समय की तुलना में छह गुना से अधिक
इस वृद्धि का महत्व इसलिए भी है क्योंकि सिंचाई क्षेत्र बढ़ने से किसानों को केवल एक मौसम की बारिश पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध जल संसाधनों के आधार पर कृषि गतिविधियों को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है।
खेतों तक पानी पहुंचने से कृषि को मिला नया आधार
सिंचाई सुविधा का विस्तार किसी जिले की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। जीपीएम में सिंचाई का दायरा बढ़ने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए पानी की उपलब्धता का आधार भी विस्तृत हुआ है।
जहां पहले बड़ी संख्या में खेतों की कृषि गतिविधियां बारिश पर निर्भर थीं, वहीं सिंचाई अधोसंरचना के विस्तार से किसानों को उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिला है। पर्याप्त पानी उपलब्ध होने पर किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि गतिविधियों का विस्तार कर सकते हैं और बहुफसलीय खेती की दिशा में भी आगे बढ़ सकते हैं।
सिंचाई सुविधाओं के विस्तार का असर खेतों की उत्पादकता के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है। खेती से जुड़े काम, स्थानीय बाजार, परिवहन और अन्य ग्रामीण गतिविधियों को भी इससे आधार मिलता है।
जिले की प्रमुख जल संरचनाएं बनीं विकास का आधार
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में विकसित जल संसाधन अधोसंरचना के तहत कई जल संरचनाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इनमें ग्राम देवरगांव का मलनिया जलाशय, ग्राम आंदुल का जोगीडोंगरी जलाशय और ग्राम बनझोरका का एनीकट प्रमुख हैं।
ये संरचनाएं स्थानीय स्तर पर जल संचयन और सिंचाई सुविधा के विस्तार के प्रयासों को दर्शाती हैं। जलाशय और एनीकट जैसी संरचनाएं बारिश के पानी को रोकने, उसका उपयोग करने और आवश्यकता के अनुसार कृषि क्षेत्र तक पहुंचाने में उपयोगी होती हैं।
माइक्रो और लिफ्ट इरिगेशन से बढ़ा जल उपयोग का दायरा
सिंचाई विस्तार के साथ अब केवल पारंपरिक जल वितरण व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर भी जोर दिया जा रहा है। जिले में माइक्रो इरिगेशन और लिफ्ट इरिगेशन को बढ़ावा देने का उद्देश्य उपलब्ध पानी का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करना है।
लिफ्ट इरिगेशन के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जा सकती है जहां प्राकृतिक ढलान के कारण पारंपरिक तरीके से पानी पहुंचाना कठिन होता है। वहीं माइक्रो इरिगेशन तकनीक के माध्यम से पानी की बचत करते हुए फसलों तक नियंत्रित तरीके से पानी पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।
सोलर पंप और डिजिटल तकनीक का भी इस्तेमाल
जल प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए जिले में सोलर पंप और डिजिटल तकनीक के उपयोग पर भी जोर दिया जा रहा है। सौर ऊर्जा आधारित पंपों के इस्तेमाल से सिंचाई व्यवस्था में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत का उपयोग संभव होता है।
वहीं डिजिटल तकनीक के माध्यम से जल वितरण और सिंचाई व्यवस्था की निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे जल संसाधनों के उपयोग और प्रबंधन की प्रक्रिया को आधुनिक तकनीक से जोड़ने में मदद मिलती है।
सिंचाई के साथ जल संरक्षण पर भी फोकस
जिले में जल संसाधन विकास का उद्देश्य केवल सिंचाई क्षेत्र बढ़ाना नहीं है। इसके साथ जल संरक्षण और भविष्य के लिए जल उपलब्धता बनाए रखने पर भी जोर दिया जा रहा है।
नदी संरक्षण, एनीकट निर्माण और भू-जल संवर्धन जैसे कार्य इसी व्यापक जल प्रबंधन का हिस्सा हैं। बारिश के पानी को संरक्षित करना, सतही जल स्रोतों को मजबूत करना और भू-जल स्तर को बेहतर बनाए रखने के प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लंबे समय में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
जल संरक्षण और सिंचाई विस्तार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि उपलब्ध जल का संरक्षण बेहतर तरीके से किया जाता है तो सिंचाई के लिए जल संसाधनों की उपलब्धता भी मजबूत होती है।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बढ़े अवसर
किसी क्षेत्र में सिंचाई क्षमता का विस्तार सीधे तौर पर कृषि गतिविधियों के विस्तार से जुड़ा होता है। जीपीएम जैसे ग्रामीण और कृषि प्रधान क्षेत्र में पानी की उपलब्धता बढ़ने से खेती के लिए आधार मजबूत होता है।
सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने से किसान फसल उत्पादन की योजना स्थानीय जल उपलब्धता के आधार पर बना सकते हैं। इससे कृषि गतिविधियों का दायरा बढ़ाने, अतिरिक्त फसल लेने और खेती से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
इसी वजह से जिले में 4,458 हेक्टेयर से बढ़कर 25,936 हेक्टेयर हुई सिंचाई क्षमता को केवल आंकड़ों में हुई वृद्धि के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह जिले में लंबे समय के दौरान विकसित हुई जल अधोसंरचना और उसके कृषि क्षेत्र पर संभावित प्रभाव को भी दर्शाती है।
नई सिंचाई योजनाओं से क्षमता में और बढ़ोतरी की उम्मीद
जीपीएम जिले में सिंचाई विस्तार की प्रक्रिया अभी भी जारी है। वर्तमान में कई नई सिंचाई योजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनके पूरा होने के बाद जिले की सिंचाई क्षमता में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
नई परियोजनाओं के पूरा होने से अतिरिक्त कृषि क्षेत्र को पानी उपलब्ध कराने का आधार तैयार होगा। इसके साथ ही जिले की जल प्रबंधन अधोसंरचना भी और मजबूत होगी। भविष्य में सिंचाई विस्तार के साथ जल संरक्षण, आधुनिक तकनीक और बेहतर जल वितरण व्यवस्था पर जोर जिले के ग्रामीण विकास को नई दिशा दे सकता है।
25 वर्षों की विकास यात्रा में दिखा बड़ा बदलाव
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में जल संसाधन विभाग की 25 वर्षों की यात्रा को देखें तो राज्य गठन के समय की सीमित सिंचाई सुविधाओं से लेकर वर्तमान में विकसित व्यापक जल संसाधन नेटवर्क तक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है।
28 पुरानी परियोजनाओं से बढ़कर कुल 85 जल संसाधन योजनाओं का आधार, 4,458 हेक्टेयर से बढ़कर 25,936 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता और 21,476 हेक्टेयर की अतिरिक्त सिंचाई क्षमता इस बदलाव के प्रमुख आंकड़े हैं।
जलाशयों और एनीकट के निर्माण से लेकर नहरों के विस्तार, माइक्रो एवं लिफ्ट इरिगेशन, सोलर पंप और डिजिटल तकनीक के उपयोग तक जल प्रबंधन को धीरे-धीरे आधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है।
आने वाले समय में नई परियोजनाओं के पूरा होने के साथ सिंचाई का दायरा और बढ़ने की संभावना है। इससे जिले में कृषि गतिविधियों को अतिरिक्त आधार मिलने के साथ जल संरक्षण और ग्रामीण अधोसंरचना को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
इस तरह जीपीएम की सिंचाई यात्रा को केवल जल संरचनाओं के निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि खेतों तक पानी पहुंचाने, कृषि संभावनाओं को विस्तार देने और ग्रामीण क्षेत्रों में जल आधारित विकास का आधार तैयार करने की दीर्घकालीन प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।



