बिज़नेस (Business)

तेल संकट और डॉलर डिमांड ने तोड़ी रुपये की कमर, ऑल-टाइम लो पर पहुंची भारतीय मुद्रा…

19 मार्च 2026 को रुपया पहली बार 93 प्रति डॉलर के ऊपर निकल गया और 20 मार्च को यह गिरकर 93.7350 तक पहुंचा, जो अब तक का रिकॉर्ड लो है। यह गिरावट सिर्फ करेंसी मार्केट की तकनीकी चाल नहीं है, बल्कि तेल, युद्ध, डॉलर डिमांड और विदेशी निवेशकों की बिकवाली—इन सबका मिला-जुला असर है।

सबसे बड़ी वजह है मिडिल ईस्ट युद्ध से पैदा हुआ तेल संकट। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में है, इसलिए जैसे ही ईरान युद्ध ने ऊर्जा सप्लाई को झटका दिया, बाजार को डर लगने लगा कि भारत का import bill तेजी से बढ़ेगा। इसी तनाव में ब्रेंट क्रूड इस हफ्ते करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, हालांकि बाद में कुछ नरमी आई। तेल महंगा होने का सीधा मतलब है भारत को ज्यादा डॉलर चाहिए, और यही बात रुपये पर दबाव बढ़ाती है।

दूसरी बड़ी वजह है डॉलर की मांग बढ़ना। जब भारत ज्यादा महंगा तेल खरीदता है, तो ऑयल कंपनियां अधिक डॉलर खरीदती हैं। इससे घरेलू बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है। युद्ध के बाद से रुपये में करीब 3% की गिरावट आ चुकी है, जो बताती है कि यह दबाव एक-दो दिन का नहीं, बल्कि लगातार बना हुआ है।

तीसरा फैक्टर है विदेशी निवेशकों की निकासी। मार्च में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 8 अरब डॉलर से ज्यादा निकाले। जब FIIs बिकवाली करते हैं, तो वे अपनी रकम डॉलर में बाहर ले जाते हैं। इससे भी डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया और फिसलता है। यही वजह है कि करेंसी, इक्विटी और बॉन्ड—तीनों बाजारों पर दबाव दिख रहा है।

चौथी वजह है global flight to safety। जब दुनिया में जंग, सप्लाई संकट और महंगाई का डर बढ़ता है, तो निवेशक आमतौर पर अमेरिकी डॉलर जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली परिसंपत्तियों की तरफ भागते हैं। इससे डॉलर और मजबूत होता है। मजबूत डॉलर का मतलब यह कि उभरते बाजारों की मुद्राएं, खासकर तेल आयातक देशों की, ज्यादा दबाव में आ जाती हैं।

इस गिरावट का असर सिर्फ एक्सचेंज रेट तक सीमित नहीं है। रुपया कमजोर होने से आयात महंगा हो जाता है, खासकर तेल, गैस, केमिकल्स और दूसरे जरूरी इनपुट। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा है। IMF ने भी चेताया है कि अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो इससे inflation बढ़ सकती है और growth घट सकती है। भारत जैसे देश के लिए यह double hit है—एक तरफ growth पर असर, दूसरी तरफ inflation का दबाव।

रुपये की गिरावट का एक और असर बॉन्ड मार्केट पर दिखा। तेल झटके और महंगाई की आशंका के बीच भारतीय म्यूचुअल फंड्स ने मार्च में रिकॉर्ड रफ्तार से सरकारी बॉन्ड बेचे। इसका मतलब यह है कि बाजार अब सिर्फ करेंसी weakness नहीं, बल्कि broader economic risk को भी price in कर रहा है।

एक आसान तरीके से समझें तो रुपये के 93 पार जाने के पीछे ये मुख्य कारण हैं:
तेल महंगा, डॉलर की मांग ज्यादा, विदेशी पैसा बाहर, और वैश्विक डर के बीच डॉलर मजबूत। इन चारों ने मिलकर रुपये को ऑल-टाइम लो पर धकेला है।

मार्केट की आगे की चिंता भी यहीं है। रॉयटर्स के मुताबिक अगर युद्ध लंबा खिंचा और तेल ऊंचा बना रहा, तो रुपया 95 प्रति डॉलर तक भी जा सकता है। हालांकि RBI की दखलअंदाजी गिरावट को कुछ हद तक थाम सकती है। अभी तस्वीर यही है कि दबाव तुरंत खत्म होता नहीं दिख रहा।

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