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रुपये की जोरदार वापसी, विदेशी निवेश और RBI सपोर्ट से बढ़ी मजबूती..

भारतीय रुपया (Indian Rupee) गुरुवार, 12 फरवरी को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ। पिछले कारोबारी दिन कमजोरी के बाद रुपये में यह तेजी कई घरेलू और वैश्विक कारणों से आई। शुरुआती कारोबार में रुपया 38 पैसे मजबूत होकर 90.40 प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

आज रुपये में क्या हुआ?
- गुरुवार सुबह रुपया 90.55 प्रति डॉलर पर कमजोरी के साथ खुला।
- लेकिन कुछ ही समय में इसमें तेजी आई और यह 90.40 प्रति डॉलर तक मजबूत हो गया।
- इससे पहले बुधवार (11 फरवरी) को रुपया 22 पैसे गिरकर 90.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।
- यानी एक दिन की गिरावट के बाद अगले दिन रुपये ने मजबूत वापसी की।
रुपया मजबूत होने के मुख्य कारण
1. विदेशी निवेश (FII inflow) से मिला बड़ा सहारा
- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार में ₹943.81 करोड़ का निवेश किया।
- जब विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगाते हैं, तो वे डॉलर बेचकर रुपये खरीदते हैं।
- इससे बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ती है और रुपया मजबूत होता है।
- लगातार विदेशी निवेश से रुपये को मनोवैज्ञानिक और वास्तविक सपोर्ट मिला।
2. बैंकिंग सिस्टम में बढ़ी लिक्विडिटी
- भारतीय बैंकिंग सिस्टम में करीब ₹3 लाख करोड़ (₹3 ट्रिलियन) की सरप्लस लिक्विडिटी रही, जो पिछले 6 महीनों में सबसे ज्यादा है।
- इसका मतलब है कि बैंकों के पास नकदी की कमी नहीं है।
- इससे बाजार में स्थिरता आती है और रुपये पर दबाव कम होता है।
- RBI की संतुलित लिक्विडिटी मैनेजमेंट नीति ने रुपये को मजबूत करने में मदद की।
3. डॉलर इंडेक्स में बड़ी तेजी नहीं
- डॉलर इंडेक्स करीब 96.78 पर रहा, जो बहुत ज्यादा मजबूत स्तर नहीं है।
- जब डॉलर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं होता, तो रुपये जैसी करेंसी पर दबाव कम रहता है।
- इससे रुपये को मजबूत होने का मौका मिला।
4. ग्लोबल मार्केट में स्थिर माहौल
- US जॉब्स डेटा मजबूत था, लेकिन ग्लोबल करेंसी मार्केट में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं हुआ।
- एशियाई करेंसी भी स्थिर रहीं।
- ऐसे माहौल में रुपये की दिशा तय करने में घरेलू फैक्टर्स ज्यादा प्रभावी रहे।
रुपये के सामने अभी भी मौजूद जोखिम
1. कच्चे तेल की कीमतें
- ब्रेंट क्रूड करीब $69.69 प्रति बैरल के आसपास रहा।
- भारत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ज्यादा कीमत का मतलब ज्यादा डॉलर खर्च।
- इससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
2. जियोपॉलिटिकल तनाव
- दुनिया में चल रहे युद्ध और तनाव से निवेशक सतर्क रहते हैं।
- इससे विदेशी निवेश कम हो सकता है और रुपये पर असर पड़ सकता है।
3. डॉलर की लगातार मांग
- भारत में इंपोर्ट करने वाली कंपनियां लगातार डॉलर खरीदती रहती हैं।
- इससे डॉलर की मांग बनी रहती है और रुपये की मजबूती सीमित हो सकती है।
4. US-भारत ट्रेड अनिश्चितता
- ट्रेड डील और टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता के कारण निवेशक सतर्क हैं।
- इसका असर करेंसी मार्केट पर भी पड़ सकता है।
इसका आम लोगों पर क्या असर होगा?
फायदा
- विदेश यात्रा और पढ़ाई सस्ती हो सकती है
- इंपोर्टेड सामान जैसे मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स सस्ते हो सकते हैं
- विदेशी कर्ज का बोझ कम होता है
नुकसान
- IT और एक्सपोर्ट कंपनियों की कमाई पर असर पड़ सकता है
- निर्यातकों को कम रुपये मिलते हैं
आगे रुपये का रुख कैसा रह सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर
- विदेशी निवेश जारी रहता है
- RBI लिक्विडिटी संतुलित रखता है
- और डॉलर ज्यादा मजबूत नहीं होता
तो रुपया 90–91 प्रति डॉलर के दायरे में स्थिर रह सकता है।



